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बैंबू स्टिक से कानी वर्क कर 8 महीने में तैयार की जाती है ये पश्मीना शॉल, सबसे पहले देवी मां को अर्पित होती है ये साड़ी

अगर आप भी सर्दियों के इस सीजन में खूबसूरत पश्मीना शॉल की तलाश कर रही हैं, तो भोपाल में यहां इसका बाजार सजा है...भोपाल हाट में लगे एक्सपो में सज रहा है साडिय़ों का बाजार भी...

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भोपाल। सर्दियों का सीजन शुरू हो चुका है। इस सीजन में स्वेटर, जैकेट के बाजार सजे हैं। आप चाहें मॉल से खरीदें या फिर बाजार से आपको अपनी मनचाहे और पसंदीदा वॉर्म वियर आसानी से मिल जाएंगे। लेकिन अगर आपको पश्मीना शॉल की तलाश है तो आप भोपाल हाट जा सकती हैं। जीहां यहां आपको कश्मीर का खूबसूरत पश्मीना शॉल आसानी से मिल जाएगा। आपको बता दें कि भोपाल हाट में शुक्रवार से स्टेट हैंडलूम एक्सपो शुरू हुआ है। एक्सपो में 14 राज्यों के 100 बुनकर आए हुए हैं। मप्र हस्तशिल्प एवं हथकरघा विकास निगम की ओर से आयोजित यह एक्सपो 22 दिसंबर तक चलेगा। यहां दोपहर-12 से रात-9 बजे तक आप खरीदारी कर सकते हैं।

ये हैं मशहूर कारीगर
एक्सपो में कश्मीर से आए नेशनल अवार्ड विनर अब्दुल रशीद ने बताया कि वे यहां पश्मीना और सेमी पश्मीना शॉल लेकर आए हैं। सेमी पश्मीना शॉल को यॉक वूल से बनाया गया है। उन्हें 2010 में स्टेट और 2018 में नेशनल अवार्ड मिला था। ये अवॉर्ड ट्यूलिप डिजाइन तैयार करने के लिए उन्हें दिया गया था।

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6-10 महीने में तैयार होती है यह शॉल
अब्दुल यहां कानी वर्क डिजाइन की शॉल लेकर आए हैं। इसमें बैंबू स्टिक से काम किया जाता है। इसके लिए पहले कम्प्यूटर पर डिजाइन तैयार कर लिया जाता है। उस डिजाइन को देखकर दो कारीगर बैंबू सेे कपड़े पर वर्क करते हैं। यह काम इतना बारीक होता है कि एक दिन में महज एक से दो इंच काम ही हो पाता है। पूरी शॉल बनाने में 6 से 10 महीने का समय लग जाता है। यानि कपड़े पर जितना ज्यादा वर्क होगा, उसे तैयार करने में उतना ही ज्यादा समय लगेगा।

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हैवी जाला डिजाइन की साडिय़ां भी, पहली साड़ी देवी मां को होती है अर्पित
एक्सपो में छत्तीसगढ़ से आए स्टेट अवार्डी प्रेमलाल देवांगन ने बताया कि वे हैवी जाला डिजाइन की साड़ी लेकर यहां आए हैं। इसे बनाने में करीब 15 दिन का समय लगता है। इसमें पूरा डिजाइन एक जैसा दिखता है। उन्होंने कोसा में ट्राइबल आर्ट वर्क कर साड़ी तैयार की है। इस पर किसान, खेत और ढाणी को उकेरा है। कोसा के कपड़े तैयार करने की सैकड़ों साल की परंपरा है। हर कारीगर पहला पीस जब तैयार करता है तो उसे ममलेश्वरी देवी को अर्पित करता है।

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