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पत्ता गोभी खाने से क्यों डरते हैं लोग, जानिए कौन सा होता है वो कीड़ा

इसे खाने के दौरान विशेष सावधानी बरतने की जरूरत होती है....

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भोपाल। पत्ता गोभी अन्य सब्जियों की तरह न्यूट्रिशन और प्रोटीन से भरपूर होती है। पत्ता गोभी में फाइबर की मात्रा अधिक होती है, जो डाइटिंग करने वालों के लिए फायदेमंद है। लेकिन, इसे खाने के दौरान विशेष सावधानी बरतने की जरूरत होती है। अन्यथा थोड़ी सी लापरवाही महंगा पड़ सकती है। पत्ता गोभी में टेव वर्म (कीड़ा) (tapeworm) होता है जो खाने पर दिमाग में पहुंच जाता है।

विशेषज्ञों के अनुसार, बंदगोभी और पत्ता गोभी में कीड़ा इतना पतला और छोटा होता है कि देखा नहीं जा सकता। गोभी के कीड़े की रेजिस्टेंस पावर ज्यादा होती है। ये पेट में पाए जाने वाले एसिड व एंजाइम से भी नहीं मरता। अगर तापमान पानी के उबाल जितना भी हो जाए, तो भी यह जिंदा रहता है। ये दिमाग पर ही वार करता है। जैसे ही ये दिमाग पर अपना असर डालता है, रोगी को दौरे पड़ने लग जाते हैं। ऑपरेशन में देरी और गड़बड़ी से पूरे शरीर को लकवा मार सकता है।

जानिए टेपवर्म के बारे में कुछ बातें

टेपवर्म बारिश के पानी या और किसी वजह से जमीन में पहुंचता है और कच्ची सब्जियों के जरिए फिर हम तक पहुंचता है। पेट में पहुंचने के बाद ये कीड़ा सबसे पहले आंतों, फिर ब्लड फ्लो के साथ नसों के जरिए दिमाग तक पहुंचता है। इसका लार्वा दिमाग को गंभीर चोट पहुंचा देता है। टेपवर्म से होने वाला इन्फेक्शन टैनिएसिस (taeniasis) कहलाता है. शरीर में जाने के बाद, ये कीड़ा अंडे देता है. जिससे शरीर के अंदर जख्म बनने लगते हैं।

इस कीड़े की 5 हजार से ज्यादा प्रजातियां बताई जाती हैं। भारत में टेपवर्म से होने वाली परेशानी 20-25 साल पहले सामने आई. तब देश के अलग-अलग हिस्सों में लोग सिर में तेज दर्द की शिकायत के साथ हॉस्पिटल पहुंचे और उन्हें मिर्गी की तरह दौरे पड़ रहे थे.अब बहुत सी जगहों पर पत्ता गोभी की जगह बजाय लेट्यूस लीव्स इस्तेमाल की जाती है. इस कीड़े का लार्वा पालक, मछली, पोर्क या बीफ में भी पाया जाता है. इन चीज़ों को भी अच्छी तरह पकाकर खाना चाहिए।

पेट के आहार को ही अपना भोजन बनाते हैं

इस कीड़ें की तीन प्रजातियां (1) टीनिया सेगीनाटा, (2) टीनिया सोलिअम और (3) टीनिया एशियाटिका होती हैं। ये लीवर में पहुंचकर सिस्ट बनाता है, जिससे पस पड़ जाता है। ये आंख में भी आ सकता है। ये कीड़े हमारे पेट के आहार को ही अपना भोजन बनाते हैं। जिस व्यक्ति के दिमाग में पहुंचते हैं उसे दौरे पड़ने लगते हैं. शुरुआत में इसके कोई लक्षण नहीं दिखाई देते लेकिन सिर दर्द, थकान, विटामिन्स की कमी होना जैसे लक्षण दिखाई देते है। दिमाग में अंडों का प्रेशर इस कदर बढ़ता है कि दिमाग काम करना बंद कर देता है।

12 लाख लोग न्यूरोसिस्टिसेरसोसिस से पीड़ित हैं

कहा जाता है कि दिमाग में कोई बाहरी चीज आ जाए तो उससे दिमाग का अंदरूनी संतुलन बिगड़ जाता है. एक टेपवर्म की लंबाई 3.5 से 25 मीटर तक हो सकती है। इसकी उम्र 30 साल तक होती है. इस कीड़े के इलाज के तौर पर वे दवाएं दी जाती हैं, जिससे ये मर जाए। या फिर सर्जरी भी की जा सकती है. कीड़े से बचने के लिए डॉक्टर्स का कहना है कि जिन चीज़ों में ये कीड़ा पाया जाता है, वे अधपकी खाने से टेपवर्म पेट में पहुंचते हैं. भारत में टेपवर्म का संक्रमण सामान्य है. यहां करीब 12 लाख लोग न्यूरोसिस्टिसेरसोसिस से पीड़ित हैं, ये मिर्गी के दौरों की खास वजहों में से एक है।