
भोपाल। नवजात शिशु से लेकर 5 साल तक के बच्चों की विकृतियों को दूर करने एम्स में सपोर्टर बनाए जा रहे हैं। अब तक इसके लिए मरीज को जयपुर, मुंबई और दिल्ली जाना पड़ता था। साथ ही संग्रहालय में मौजूद जानकारी से किस तरह के बाहरी अंग लगवाना चाहिए, यह फैसला लेना भी आसान होगा। यह उपकरण बनाने की जिम्मेदारी प्रॉस्थेटिक्स व ओर्थोटिक्स स्मिता पाठक को दी गई है। बच्चों की शारीरिक विकृतियों को दूर करने एम्स में पीडियाट्रिक ऑर्थोटिक्स अनुभाग शुरू हुआ है।
अपनी तरह का यह प्रदेश का पहला संस्थान हैं, जहां पीडियाट्रिक ऑर्थोटिक अनुभाग व प्रोस्थेटिक और ऑर्थोटिक संग्रहालय का संचालन हो रहा है। इससे विकृति की जानकारी और इलाज दिया जा सकता है। जिससे बच्चे आगे का जीवन बेहतर तरीके से जी सकें। इसे केंद्र सरकार की शारीरिक विकृतियों के लिए बनाई गई योजना से जुड़ने के बाद मरीज पर 60 फीसदी खर्च का दबाव कम हो जाएगा।
| केस-1 | बचपन से 5 साल के बच्चे की रीढ़ की हड्डी मुड़ी हुई है। जो समय के साथ और मुड़ती जा रही है, इसका उपचार भी किया जा रहा है। जिसके लिए बच्चे की रीढ़ की हड्डी के लिए सपोर्टर तैयार किए गए है। इन्हें हर 6 महीने में बच्चे के शरीर में आए बदलाव के आधार पर बदला जाएगा। |
| केस-2 | छतरपुर की ढाई साल की बच्ची का जन्म के समय से हाथ नहीं है। बच्ची का उपचार एम्स भोपाल में किया जा रह है। इसमें शुरुआती दौर में एक साधारण बाहरी हाथ लगाया जाएगा। जिससे बच्ची के दिमाग में यह संदेश जाए कि उसका एक नहीं बल्कि दो हाथ हैं। इसके बाद उसे भविष्य में आधुनिक तकनीक वाला हाथ मुहैया कराने का लक्ष्य है। |
सदमे से गुजरने वालों के इलाज में मिलेगी मदद
असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ स्वप्निल सोनूने ने कहा कि तकनीक का जानकारी के अभाव में सही उपयोग नहीं हो पा रहा है। आज भी किसी हादसे के चलते हुई शारीरिक विकृति से व्यक्ति गंभीर सदमे से गुजरते हैं। इसकी गंभीरता को देखते हुए प्रोस्थेटिक और ऑर्थोटिक संग्रहालय को शुरू किया गया है। इससे रोगियों को एक तरह की विकृति के लिए कितने तरह के उपकरण मौजूद है और वह किस तरह से काम करते हैं सभी जानकारी दी जाएगी।
विभाग में दिव्यांगता से संबंधित कई रोगियों की सफलता की कहानियां हैं जिससे अन्य रोगियों को प्रेरणा मिलेगी। साथ ही विभाग के छात्रों और रोगियों को उपकरणों के काम को समझने में मदद मिलेगी। हम लगातार बेहतर इलाज और सुविधा देने की दिशा में काम कर रहे हैं।
-डॉ अजय सिंह, कार्यपालक निदेशक, एम्स भोपाल
Updated on:
12 Nov 2022 11:25 am
Published on:
12 Nov 2022 11:14 am
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