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जंगल के राजा शेर का फरमान… हिन्दी बोलने पर फाइन भरना पड़ेगा

अनुगूंज समारोह में अंतिम दिन नाटक 'गज मोक्ष' और 'पीली पूंछ' का मंचन  

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जंगल के राजा शेर का फरमान... हिन्दी बोलने पर फाइन भरना पड़ेगा

जंगल के राजा शेर का फरमान... हिन्दी बोलने पर फाइन भरना पड़ेगा

भोपाल। स्कूली शिक्षा विभाग की ओर से रवीन्द्र भवन में आयोजित अनुगूंज समारोह के अंतिम दिन गुरुवार को दो नाटक 'गज मोक्ष' और 'पीली पूंछ' का मंचन हुआ। 'गज मोक्ष' जहां नेक बनने की सलाह देता है, वहीं 'पीली पूंछ' शिक्षा पद्धति पर सवाल उठाने के साथ ही पैरेन्ट्स से सवाल पूछता है कि बच्चों को किस तरह की शिक्षा दी जा रही है। पैरेन्ट्स अच्छी जिंदगी के लिए जॉब तो कर रहे हैं, लेकिन बच्चों के लिए समय नहीं है।

नौ ग्रह और बाबा की भक्ति में क्यों हो उलझे

50 मिनट के नाटक 'पीली पूंछ' में 6 स्कूलों के 53 बच्चों ने अभिनय किया। एक महीने की वर्कशॉप में तीसरी से 11वीं तक के बच्चों ने थिएटर की बारिकियां सीखीं। नाटक कल्पनालोक के आसमान में रहने वाली दादी और भुलक्कड़ पोते चंदू (चांद) की कहानी है। दादी ब्रह्मांड के लिए सपने बुनती हैं, जिसे लोगों तक चंदू पहुंचाता है।

नाटक की शुरुआत में जंगल में शेर के छोटे बच्चे से होती है। खेल-खेल में उसकी पूंछ कट गई है। वह सपना देखता है कि उसकी एक सुंदर सी पूंछ हो। दादी सपना बुनती है और चंदू से कहती है कि जाकर ये शेर को दे आओ। चंदू सपना लिए निकलता है और सौर मंडल में पहुंचता है। जंगल पहुंचने से पहले उसका सामना नौ ग्रहों से होता है, फिर बादल, चिडिय़ा, पतंग, हवाई जहाज, बाबा डोरमन से होकर शेर तक पहुंचता है। चंदू के भुलक्कड़पन के कारण मजेदार स्थितियां बनती है। अंतत: शेर का सपना पूरा हो जाता है।

बच्चों का बड़ा कॉन्फिडेंस लेवल

नाटक के डायरेक्टर सौरभ अनंत का कहना है कि थिएटर से इन बच्चों का कॉन्फिडेंस लेवल बढ़ा है। नाटक में यह मैसेज है कि बाल कल्पनाओं वाली दादी-नानी की कहानी की जगह टीवी और मोबाइल ने ले ली है। साथ ही पैरेन्ट्स से यह सवाल है कि बच्चे बस्ते के बोझ तले दबते जा रहे हैं। इस कारण वे खेल और बाल जीवन की मस्ती से दूर होते जा रहा है। नाटक में एक बाल कलाकार कहता है कि कार्टून बाबा भोले मोन आपकी भक्ति के कारण मां बड़ी खुश है कि क्योंकि मैं बाहर खेलने की बजाए दिनभर टीवी के सामने ही बैठा रहता हूं...।

वहीं एक अन्य डायलॉग में शेर ये आदेश देता है कि जंगल में आज से कोई हिन्दी नहीं बोलेगा, वरना उसे फाइन भरना पड़ेगा। इस संवाद के माध्यम से अंग्रेजी माध्यम में शिक्षा देने वाले उस स्कूलों पर कटाक्ष किया गया, जो हिन्दी बोलने पर बच्चों से जुर्माना वसलूते हैं। नाटक में वैकल्पिक शिक्षा पद्धति की बात की है। नाटक में अंग्रेजी करेगी बेढ़ा पार, चलो अंग्रेजी सीखे..., बाबा भोले मोन बच्चों के भगवान... और भूला भाल चंदू चला है चला है सपना लेकर शेर... जैसे गानों ने दर्शकों को बांधे रखा।

अच्छा और नेक बनने की दी सीख

इससे पहले गज मोक्ष की प्रस्तुति हुई। 55 मिनट के इस नाटक में शहर के 6 स्कूलों के 50 कलाकारों ने अभिनय किया। लेखक सुनिल मिश्र है। संगीत सुरेन्द्र वानखेड़े ने दिया। निर्देशन केजी त्रिवेदी का है। बाल कलाकारों ने हाथी, घोड़ा, बंदर जैसे जानवरों के मास्क पहन रखे थे। इनका निर्माण उज्जैन के आर्टिश्ट विशाल और नरेन्द्र ने किया है। नाटक गज मोक्ष नाटक आधारित है गज यानि ऐसे सफेद रंग के ऐसे हाथी पर जो सबकी सहायता करने वाला है। एक दिन उसका दोस्त बंदर बताता है कि उसके समूह के अन्य बंदर उसे परेशान करते हैं उसके कमजोर होने का मजाक उड़ाते हैं। तब वह सफेद हाथी उसकी सहायता करता है और बंदरों के राजा को बुलाकर समझाता है। इसके बाद सभी बंदर उस छोटे बंदर के साथ बड़ा ही अच्छा व्यवहार करने लगते हैं। हाथी को एक गरीब आदमी मिलता है, वह उससे बात करता है। ऐसा सिलसिला चलता रहता है और हाथी और वह गरीब आदमी अच्छे दोस्त बन जाते हैं।

आदमी दांत समेत धरती में समा जाता है
एक दिन वह गरीब आदमी गांव के बाजार में हाथी के दांत बिकते देखता और उसके बारे में पूछता है, तब उसे पता चलता है कि हाथी का दांत तो अच्छे दामों में बिकता है। जब वह जंगल जाता है तो उसे उदास देखकर हाथी कारण पूछता है, इस पर वह गरीब आदमी कहता है कि यदि तुम मुझे अपना एक दाँत दे दो तो मेरी पूरी गरीबी दूर हो जाएगी। उसकी बात सुनकर हाथी अपने दोस्त पर दया करके एक दांत दे देता है। उसे बेचकर उसका दोस्त अपनी गरीबी दूर कर लेता है, लेकिन वह इन रुपयों से कोई काम नहीं करता बल्कि और आलसी हो जाता है। कुछ सालों में उसका धन समाप्त हो जाता है, तो वह पुन: हाथी के पास पहुंचता है।