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यहां पर कुबेर की नाभि में इत्र अर्पित करने से होती है धन-ऐश्वर्य और सौभाग्य की वर्षा

Dhanteras 2025: धनतेरस पर उज्जैन में बड़ी संख्या में श्रद्धालु एक अद्भुत परंपरा निभाने पहुंचेगे। सांदीपनि आश्रम और महाकालेश्वर मंदिर के कोटितीर्थ कुड के समीप स्थित प्राचीन कुबेर प्रतिमा पर विशेष पूजा-अर्चना होगी। परंपरा के अनुसार, इस दिन श्रद्धालु कुबेर की नाभि में इन अर्पित कर सुख-समृद्धि और धनवृद्धि की कामना करते हैं।
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भोपाल

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Avantika Pandey

•

Updated: 17 Oct 2025, 8:14 AM IST

Dhanteras 2025

Dhanteras 2025 (फोटो सोर्स : पत्रिका)

ललित सक्सेना

Dhanteras 2025: धनतेरस पर उज्जैन में बड़ी संख्या में श्रद्धालु एक अद्भुत परंपरा निभाने पहुंचेगे। सांदीपनि आश्रम और महाकालेश्वर मंदिर के कोटितीर्थ कुड के समीप स्थित प्राचीन कुबेर प्रतिमा पर विशेष पूजा-अर्चना होगी। परंपरा के अनुसार, इस दिन श्रद्धालु कुबेर की नाभि में इन अर्पित कर सुख-समृद्धि और धनवृद्धि की कामना करते हैं। 'नाभी इत्रं समप्यत, लक्ष्मीकुबेर प्रसीदतु' का अर्थ है- कुबेर की नाभि में इन अर्पण करने से लक्ष्मी और कुबेर दोनों प्रसन्न होते हैं। कथा के अनुसार, भगवान शिव से धन के देवता का पद मिलने पर ब्रह्मा ने कुबेर से पूछा कि धन का संचित स्रोत कहां रहेगा। तब कुबेर ने कहा- मेरा उदर और विशेष रूप से नाभि ही धन का केंद्र होगी। इस पर देवताओं ने उनकी नाभि में इत्र और पुष्प अर्पित कर धन और समृद्धि का आशीर्वाद मांगा। तभी से यह परंपरा प्रचलित हुई कि कुबेर की नाभि में इत्र लगाने से धन का स्थायित्व और शुभ संपत्ति की वृद्धि होती है।

परमारकालीन 1100 वर्ष पुरानी प्रतिमा

सांदीपनि आश्रम परिसर में 84 महादेवों में से 40वें क्रम पर स्थित श्री कुण्डेश्वर महादेव मंदिर के गर्भगृह में यह दुर्लभ कुबेर प्रतिमा स्थापित है। मंदिर के पुजारी पं. शैलेंद्र व्यास ने बताया कि प्रतिमा में कुबेर बैठे हुए हैं, एक हाथ में सोम पात्र और दूसरा वर मुदा में है। विक्रम विश्वविद्यालय के पुरातत्वविद् डॉ. रमण सोलंकी के अनुसार यह प्रतिमा परमारकालीन है और लगभग 1100 वर्ष पुरानी है। प्रतिमा में कुबेर के कंधों पर धन की पोटलियां, उभरा हुआ पेट, तीखी नाक और अलंकारित शरीर उनकी ऐश्वर्यपूर्ण छवि को वर्शाते हैं।

श्रीकृष्ण को मिला 'श्री' का वरदान

मान्यता है सांदीपनि आश्रम में शिक्षा पूर्ण करने के बाद जब गुरु वक्षिणा का समय आया तो देवताओं की ओर से कुबेर धन लेकर आश्रम पहुंचे। गुरा सांदीपनि ने खजाना लौटा दिया। श्रीकृष्ण को आदेश दिया कि वे शंखासुर से उनके पुत्र को मुक्त कराएं। ऐसा करने पर प्रक्रूर होकर गुरु-माता ने श्री प्रदान की, तभी वे श्रीकृष्ण कहलाए। कहा जाता है. कुबेर आश्रम में विराजमान हो गए।

देश-प्रदेश के प्रमुख कुबेर मंदिर

  • मंदसौरः वहां की कुबेर प्रतिमा लगभग 1300 वर्ष पुरानी है। कुबेर को नेवले पर सवार विखाया गया है. हाथों में चन की पोटली, शस्त्र और प्याला है।
  • ओंकारेश्वरः मध्य प्रदेश के तीन प्रमुख कुबेर मंदिरों में यह सबसे प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि कुबेर देव ने यहां धोर तपस्या कर शिवलिंग की स्थापना की थी।
  • वडोदराः नर्मदा नदी तट स्थित यह मंदिर लगभग 2500 वर्ष पुराना माना जाता है। धनतेरस और दीपावली पर यहां बड़ी श्रद्धा से दर्शन किए जाते हैं।
  • जागेश्वर धामः उत्तराखंड में कल्यूरी राजवंश द्वारा निर्मित इस क्षेत्र में 7वीं से 14वीं शताब्दी के बीच बने मंदिरों में कुबेर की पूजा एकलिंग रूप में होती है।
  • काशी विश्वनाथः वाराणसी में भगवान शिव के साथ कुबेर की मूर्ति भी विराजमान है, जो धन और वैभव की रक्षा करते हैं।
  • कांचीपुरमः तमिलनाडु में प्राचीन शिल्पकला से निर्मित यह मंदिर दक्षिण भारत में कुबेर उपासना का ऐतिहासिक केंद माना जाता है।