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कोरोना मरीजों ने ब्लैक फंगस से खो दी आंखें, अब कृत्रिम आंख का सहारा

कोरोना में ब्लैक फंगस से खोई आंखें

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ब्लैक फंगस से खोई आंखें

भोपाल. हमीदिया अस्पताल के दंतरोग विभाग में ब्लैक फंगस से आंख खो चुके मरीजों के कृत्रिम आंख तैयार करने की शुरुआत की गई। सोमवार को पहली बार दो मरीजों को कृत्रिम आंख लगाई तो दोनों अपना चेहरा देख भावुक हो गए। दूसरे मरीज नवाब मियां के बेटे ने कहा कि पिता के आंख खोने के बाद लगा था कि जीवन खत्म हो गया, लेकिन अब नई जिंदगी मिल गई।

दंत रोग विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. अनुज भार्गव के मुताबिक म्यूकरमाइकोसिस ने कई लोगों की रोशनी छीन ली। इसके संक्रमण को दिमाग तक पहुंचने से रोकने के लिए कुछ मरीजों की आंख भी निकालनी पड़ी। ज्यादातर मरीजों की एक आंख निकाली गई है। आंख निकालने से इस जगह छेद हो जाता है जिससे चेहरा तो खराब लगता है, वहीं खुला होने से धूल या अन्य कचरा सीधे अंदर चला जाता जिससे संक्रमण का खतरा रहता है।

सिलिकॉन से तैयार की गई आंख
आंख का नाप लिया जाता है जिसे इंपे्रशन कहते हैं। डेंटल स्टोन एश से मोल्ड या खाका तैयार कर पिघले हुए मोम से वैक्स पैटर्न तैयार करते हैं। फिर सिलिकॉन से आंख तैयार की जाती है। इसे सेट होने २४ घंटे लगते हैं। आंख तैयार होने के बाद इसे विशेष गोंद से चिपकाया जाता है।

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डॉक्टर ने पैसे इकट्ठे कर तैयार की आंखें
कृत्रिम आंख बनाने विभाग से प्रस्ताव भेजा गया, लेकिन कोविड के चलते प्रस्ताव मंजूर नहीं हो पाया। ऐसे में विभाग के चिकित्सकों ने खुद पैसे एकत्रित कर आंख बनाने का सामान खरीदा। इस आंख का निर्माण डॉ. अनुज भार्गव के साथ डॉ. कविता राज, डॉ. महक गुप्ता और डॉ. अरविंद प्रधान ने किया।

गांधी मेडिकल कॉलेज के डीन डॉॅ. अरविंद राय ने बताया कि हमीदिया अस्पताल में लगातार बेहतर और उच्चस्तरीय काम होता है। कृत्रिम आंख निर्माण की शुरूआत से उन लोगों को फायदा होगा जो निजी संस्थानों में महंगा इलाज नहीं करा सकते।

अब किसी से चेहरा छुपाने की जरूरत नहीं होगी, न ही चेहरे को ढंकने के लिए किसी कपड़े की जरूरत होगी— 56 साल के निर्मल को जब कृत्रिम आंख लगाई तो उनका चेहरा देख उनकी पत्नी खुशी से रुआंसी हो गई। उन्होंने डॉक्टर को धन्यवाद देकर कहा कि मेरी जिंदगी फिर से पहले जैसी हो गई। अब बच्चे भी इनको देख डरेंगे नहीं। इस आंख से रोशनी भले ही न मिले, लेकिन अब भरोसा जरूर मिलेगा।