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दवा है या जहर: एमपी के अस्पतालों में मिल रही ‘नकली’ दवाइयां, जांच में 10 फेल

Medicines - बैच को ब्लैकलिस्ट किया, लेकिन कंपनी पर एफआइआर नहीं

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Fake medicines being supplied in MP's government hospitals

Fake medicines being supplied in MP's government hospitals (फाइल फोटो- IANS)

Medicines -प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में अमानक दवाओं की सप्लाई जारी है। 2026 की शुरुआत से अभी तक 10 तरह की दवाएं अमानक मिल चुकी हैं। सात तो केवल फरवरी में ही अमानक पाई गईं। इनमें सबसे ज्यादा जीवनरक्षक सिफिक्सिम, एमिकेसिन,सिप्रोफ़्लोक्सेसिन और मीरोपीनम जैसी एंटीबायोटिक दवाएं शामिल हैं। मीरोपीनम इंजेक्शन तो सीवियर संक्रमण की स्थिति में मरीजों की जान बचाने के लिए दिया जाता है जब अन्य एंटीबायोटिक्स असर नहीं करते। यही नहीं ब्लड ग्रुपिंग किट तक अमानक पाई गई है, जिससे मरीजों को खून चढ़ाने से पहले उसके ग्रुप का पता लगाया जाता है।

दवाओं के अमानक होने का पता तब चला जब असर नहीं करने के कारण जिलों से सीएमएचओ या सिविल सर्जन आदि ने जांच कराई। इससे पहले कई मरीजों को दवाएं दी जा चुकी थीं। हालांकि हेल्थ कॉर्पोरेशन ने संबंधित बैच के उपयोग पर रोक लगाने के साथ ही संबंधित दवा को एक-दो साल तक ब्लैकलिस्ट किया है। बार-बार ऐसे मामले सामने आने के
बाद भी अभी तक किसी भी कंपनी के खिलाफ एफआइआर दर्ज नहीं कराई गई है।

ये दवाएं अमानक
एथामसिलेट ब्लीडिंग रोकने में उपयोग की जाती है जबकि सिफिक्सिम टेबलेट एंटीबायोटिक है, पैरासिटामोल टैबलेट बुखार, दर्द में उपयोगी, पायरोक्सीकैम स्ट्रांग पेन किलर खासतौर पर अर्थराइटिस,स्पांडिलाइटिस के दर्द में,मीरोपीनम इंजेक्शन सीवियर संक्रमण रोकने वाला एंटीबायोटिक सिप्रोफ़्लोक्सेसिन टेबलेट एंटीबायोटिक, ब्लड ग्रुपिंग किट ब्लड ग्रुप पता करने के लिए ब्लड बैंक में उपयोग,एमिकेसिन इंजेक्शन एंटीबायोटिक, सिफिकि्सम सिरप एंटीबायोटिक, इटराकोनाजोल कैप्सूल फंगल इंफेक्शन में उपयोगी है

ऐसी है तीन स्तरीय जांच व्यवस्था
मप्र पब्लिक हेल्थ सर्विसेज कॉर्पोरेशन डब्ल्यूएचओ जीएमपी सर्टिफाइड कंपनियों से दवा खरीदने और सप्लाई के पहले
एनएबीएल लैब का सर्टिफिकेट लेने का दावा करता है। इसके बाद रैंडम सैंपलिंग कर जांच कराने की बात कही जाती है। सप्लाई से पहले भी जांच कराई जाती है।

सर्टिफिकेट ऑफ फार्मास्युटिकल प्रोडक्ट्स सर्टिफिकेट अनिवार्य

कॉर्पोरेशन के एमडी मयंक अग्रवाल का कहना है कि सरकारी अस्पतालों में दवाओं की गुणवत्ता बनाने के हर संभव प्रयास किए जा रहे हैं। दवा खरीदी के लिए अब सीओपीपी (सर्टिफिकेट ऑफ फार्मास्युटिकल प्रोडक्ट्स) सर्टिफिकेट अनिवार्य कर दिया गया है।