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आजादी से पूर्व आंदोलन में झंडा फहराना, मतलब जेल जाना

- स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बीएल दिवाकर के आंदोलन के पल उनके पुत्र 61 वर्षीय राजीव दिवाकर की जुबानी

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भोपाल। आजादी के अमृत महोत्सव में झंडा फहराने का अधिकार आपको मिला है तो इससे बड़े गौरव की बात कोई नहीं हो सकती। इस तिरंगे को फहराने के चक्कर में कई आजादी के दीवानों ने लाठियां खाईं, जेल गए । देश की आजादी से पहले हालात यह थे कि झंडा फहराने का मतलब सीधे जेल। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के पुत्र राजीव दिवाकर बताते हैं कि उनके पिता बीएल दिवाकर अक्सर उन्हें आजादी से पहले के संघर्ष और अंगेजों की तनाशाही के किस्से सुनाते थे।

उन्होंने बताया कि 1945-46 की बात है जब स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बीएल दिवाकर ने अपने दोस्तों के साथ एक अंग्रेज की बग्गी के सामने झंडा फहरा दिया। ये इतना भारी पड़ा था कि उन्हें बरेली छोड़कर भोपाल आना पड़ा और यहां आकर आजादी की लड़ाई में कूद गए।

यहां 1947 की आजादी में झंडा फहराने पर फिर भोपाल में पुलिस की नजर में आ गए। विलिनीकरण आंदोलन से जुड़े। झंडा फहराने के चक्कर में कई बार जेल भी गए।

दो भाइयों के साथ भोपाल आए थे
बरेली में 1927 में जन्मे बीएल दिवाकर अपने दो भाइयों के साथ पंद्रह साल की उम्र में भोपाल आ गए थे। राजीव बताते हैं कि भोपाल में 200 साल की अंग्रेज हुकूमत से पहले भोपाल में 300 साल की नवाबी हुकूमत ,देश के आजाद होने के बाद भी भारत के समर्थन में नहीं थी।

किसी की सुनवाई नहीं होती थी
आपातकाल के दौरान 1975 में मीसा कानून का विरोध करते हुए भोपाल के कई लोग जेल गए। उनको सरकार ने लोकतंत्र सेनानी का दर्जा दिया है। लोकतंत्र सेनानी विभीषण सिंह निवासी बरखेड़ा ने बताया कि 1975 में आपातकाल में मीसा कानून लागू होने के दौरान भोपाल नगर में सह कार्यवाह थे।

सरकार ने गिरफ्तारियां कीं तो लोग अंडरग्राउंड हो गए। सत्याग्रह में सामने आए तो भोपाल की पुरानी जेल में ही बंद कर दिए गए। इतने लोगों को जेल में डाल दिया कि जेल भर गई थी। उस समय किसी की सुनवाई नहीं हो रही थी, न कोई दलील न वकील। खुद एलएलबी करने के बावजूद अपने केस की पैरवी नहीं कर पाए थे। विभीषण सिंह की उम्र आज 84 वर्ष है।