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रमज़ान: रब को राजी करने का बेहतर मौका

21वें रमजान से 30वें तक होता है एतेकाफ

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ramdan

रमज़ान: रब को राजी करने का बेहतर मौका

भोपाल। रमजान माह को तीन भागों में बांटकर इसकी खास फजीलत बयां की गई है। इस्लाम में रमजान के शुरुआती 10 दिन या अशरे को रहमत का अशरा बताया गया है। अब तो बरकत का दूसरा अशरा भी खत्म होने को आया। 20वें रमजान के साथ ही तीसरा अशरा शुरू हो जाएगा। इसको लेकर विभिन्न मोहल्लों में लोग एतेकाफ में बैठने की तैयारियों में जुट गए हैं।

रोजेदार घर की तमाम जिम्मेदारियों से फारिग (खाली) होकर 20वें रोजे का इंतजार कर रहे हैं। 20वें रोजे को असर की नमाज से पहले एतेकाफ की नीयत कर लोग मस्जिदों में दाखिल होते हैं, तो ईद का चांद दिखने के बाद ही मस्जिद से बाहर निकलते हैं। जमीयत उलेमा के हाजी इमरान हारून बताते हैं कि किसी खास जगह ठहरने या रुकने को एतेकाफ कहते हैं।

माहे रमजान के आखिरी अशरे में एतेकाफ का एहतमाम किया जाता है। इस बीच उनका रात दिन इबादत में बीतता है। यही वह मौका है जब बंदा अपने रब को आसानी से राजी कर सकता है। बंदों को यह सुनहरा अवसर माहे रमजान के आखिरी अशरे में मिलता है। इस एक दिन के एतेकाफ का अज्र या सवाब बहुत ही ज्यादा है।

इसके एवज में अल्लाह तआला बंदे से जहन्नम को तीन खंदक दूर कर देता है, यानी प्रत्येक रात की इबादत का सवाब इतना ज्यादा बताया गया है कि जन्नत मिलने की संभावना तय मानी जाती है।

कम हो जाता है अल्लाह से फासला

एतेकाफ में बंदे का अल्लाह से फासला कम हो जाता है। रोजेदार 21वें रमजान से 30वें रमजान तक मस्जिद में नियमित रूप से रहते हैं। इसमें उन्हें पांच ताक रातों का इनाम मिलता है। इसका सवाब एक हजार महीनों से कहीं बेहतर होता है। मस्जिद में पांच वक्त की फर्ज नमाज, कुरान की तिलावत, तस्बीह इत्यादि का पढऩा इसमें शामिल है। इनकी सहरी और इफ्तारी का इंतजाम भी मस्जिद में ही किया जाता है। एतेकफ में बैठने वालों के अल्लाह तआला अपने फजल से अगले पिछले तमाम गुनाह माफ कर देते हैं

पहला रोजा, वालिद की सीख आज भी याद है

जीवन में हर वो चीज खास होती है जो पहली बार होती है। उससे जुड़ी तमाम बाते जेहन में ताउम्र ताजा रहती हैं। मेरे लिए सबसे यादगार रोजा वहीं है जिस दिन मैंने इसका सही मतलब जाना। या यूं कहें कि मेरा पहला रोजा ही मेरा सबसे यादगार रोजा है। उस दिन मेरे वालिद मशहूर शायर शाहिद मीर ने मुझे रोजे का सही मतलब समझाया।

उस समय मेरी उम कोई 14 या 15 साल होगी। रमजान के एक दिन पहले मेरे पिता ने मुझे पास बुलाया और कहा कि अब तुम बड़े हो गए हो और रोजे रखना चाहिए। उन्होंने मुझे बताया कि रोजे का मतलब सिर्फ भूखे प्यासे रहना नहीं है। रोजा यानी तमाम बुराइयों से परहेज करना। जब मुसलमान रोजा रखता है, उसके हृदय में भूखे व्यक्ति के लिए हमदर्दी पैदा होती है।

रमजान में पुण्य के कामों का सबाव सत्तर गुना बढ़ा दिया जाता है। जब मैंने पहला रोजा रखा तो मेरी अम्मी ने मेरे लिए नए कपड़े बनवाए और रोजा पूरा हुआ तो परिवार वालों और रिश्तेदारों से कई सारे तोहफे भी मिले। पिताजी के साथ वो पहला रोजा और उनकी दी हुई सीख मुझे आज भी याद है।