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गंगा दशहरा विशेषः खतरे के निशान पर खड़ी हैं देश की 351 नदियां

गंगा यमुना भारत की सबसे प्रदूषित नदियों में शुमार, सीपीसीबी की रिपोर्ट के मुताबिक देश की अधिकांश नदियों का पानी पीने लायक नहीं रहा। करोड़ों रुपए खर्च करने के बावजूद हालत बदतर..।

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हर्ष दुबे
भोपाल। नदियों को भारत में मां का दर्जा दिया गया है, और गंगा को भारत की सबसे पवित्र नदी की संज्ञा दी गयी है बाबजूद इसके नदियों के हालात ऐसे हैं, कि उनका पानी पीने लायक नहीं रहा है। सेन्ट्रल पॉल्यूसन कंट्रोल बोर्ड की रिपोर्ट में दावा किया गया है, कि गंगा यमुना जैसी नदियों के आचमन तक से कई गंभीर बीमारियां उत्पन्न हो सकती है।

हिमालय से लेकर कन्याकुमारी तक भारत की अधिकांश नदियां खतरे के निशान पर हैं। CPCB की रिपोर्ट की मानें तो भारत के 31 राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों में स्थित 351 नदियां प्रदूषित नदियों में शामिल हैं। नदियों के संरक्षण के लिए राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना की शुरूआत की गयी। इसके अलावा नदियों व भूजल को स्थिर बनाने के लिए जल शक्ति मंत्रालय बनाया गया, और नमामि गंगे जैसी तमाम योजनाऐं लायी गयी, जिसमें करोड़ों रुपए की राशि भी खर्च की गयी, लेकिन नदियों की हालत फिर भी बदतर बनी हुई है।

2019 में लोकसभा में नदियों में प्रदूषण संबंधित एक प्रश्न पूछा गया, जिसके जबाव में बताया गया, एनआरसीपी ने अब तक देश के 16 राज्यों में फैले 77 शहरों में 34 नदियों के प्रदूषित हिस्से को कवर किया है, जिसकी स्वीकृत लागत 5,870.54 करोड़ है। विभिन्न प्रदूषण उपशमन योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए राज्य सरकारों को 2452.35 करोड़ रुपए की राशि जारी की गयी है। साथ ही बताया गया, एनआरसीपी के तहत 2522.03 एमएलड़ी (प्रतिदिन मिलियन लीटर) की एक सीवेज उपचार क्षमता (एसटीपी) बनाई गयी है। जिसके परिणामस्वरूप विभिन्न नदियों में छोड़े जाने वाले प्रदूषण भार में कमी आएगी। सरकार के इस दावे से इतर नदियों की प्रदूषित तस्वीर कुछ और ही कहानी बयां कर रही है।

जीवनदायिनी गंगा-यमुना हो चुकी हैं विषाक्त
हिन्दू धर्म ग्रन्थों में गंगा- यमुना को दो बहनें बताया गया है, जो हिमाचल की पुत्री हैं। हिन्दू धर्म के लोग भी गंगा को सबसे पवित्र नदी मानते हैं, और गंगा में डुबकी लगाने को वे अपना सौभाग्य समझते हैं, लेकिन इन दो नदियों के हालात आज ऐसे हैं, कि ये भारत की सबसे प्रदूषित नदियों में शुमार है। गंगोत्री से निकलने वाली गंगा नदी 2525 किमी का सफर तय कर बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है। ये नदी दो देश भारत- बांग्लादेश की प्यास बुझाती है। लेकिन आज पतितपावनी गंगा प्रदूषण के मुहाने पर खड़ी है।

सीपीसीबी के आंकढ़ों के मुताबिक गंगा में 80 प्रतिशत प्रदूषण सीवेज के पानी को छोढ़े जाने से होता है। अर्थात 1.3 बिलियन गंदा पानी हर दिन गंगा में छोढ़ा जाता है। जबकि 15% प्रदूषण इंडस्ट्री से निकलने वाले कचरे से होता है। यानि औद्योगिक कम्पनियों से 260 मिलियन निकलने वाला गंदा पानी या कचरा प्रतिदिन गंगा में छोढ़ा जाता है। इससे गंगा में स्नान करने वाले लोगों को हेपेटाइटिस, टायफायड़ जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा भी है। रिपोर्ट के अनुसार गंगा सबसे ज्यादा प्रदूषित कानपुर और बनारस में होती है, जहां सीवेज और फैक्ट्रियों का कचरा मोक्षदायिनी गंगा को मैला कर देता है।

वहीं यदि यमुना की बात की जाए तो हरियाणा से निकलकर दिल्ली पहुंचते ही ये नदी अपना अस्तित्व खो देती है। उत्तराखण्ड़ के यमुनोत्री से निकलने वाली यमुना 1370 किमी का सफर तय कर प्रयागराज में गंगा नदी में मिल जाती है। देश की राजधानी दिल्ली में यमुना केवल 2 फीसदी क्षेत्र में ही कलकल करती है, लेकिन फिर भी यमुना के 80 प्रतिशत प्रदूषण का कारण केवल दिल्ली ही है। 22 किमी के दायरे में फैली यमुना में दिल्ली के 40 से ज्यादा नालों का पानी छोढ़ा जाता है। यमुना नदी के रखरखाव के लिए दिल्ली सरकार अब तक 200 करोड़ और केन्द्र सरकार 1500 करोड़ से ज्यादा की राशि खर्च कर चुकी है, फिर भी यमुना अपने अस्तित्व के लिए लड़ रही है। हालांकि कोविड के दौरान लगे लॉकडाउन में यमुना का पानी में कुछ निर्मलता दिखाई दी, क्योंकि उस समय यमुना को प्रदूषित करने वाली बड़ी कम्पनियां हन्द पड़ी थी।

महाराष्ट्र की 53 तो मध्य प्रदेश की 22 नदियां है प्रदूषित
सीपीसीबी की रिपोर्ट के मुताबिक देश में सबसे ज्यादा प्रदूषित नदियों के मामलों में महाराष्ट्र अव्वल है जहां 53 नदियां खतरे के निशान पर हैं। महाराष्ट्र की गोदावरी, कालू और कुन्दालिका नदी सबसे ज्यादा प्रदूषित पायी गयी हैं, जबकि प्रदेश की मीठी नदी अब नाले में तब्दील हो चुकी है, जिस कारण मुम्बई में हर साल बाढ़ जैसी स्थिति पैदा हो जाती है। वहीं दूसरे स्थान पर असम है, जहां भरालू, बोरसोला और डीपर विल जैसी 44 नदियां प्रदूषण के मुहाने पर खड़ी हुई हैं। प्रकृति की गोद में बसे असम में भी नदियों के प्रदूषण की मुख्य वहज फीकल कोलिफोर्म बैक्टीरिया अर्थात मान वीय मल के साथ अन्य तरह के मलों को नदी में प्रवाहित करना है।

2014 की पीसीबी की रिपोर्ट के मुताबिक असम की लाइफलाइन ब्रम्हपुत्र नदी में गुवाहाटी शहर के तकरीबन 700 नालों और सीवेज का पानी छोढ़ा जाता है। वहीं एमपी 22 प्रदूषित नदियों के साथ तीसरे स्थान पर है। प्रदेश की सोन, बेतवा और तापी जैसी 22 नदियां खतरे के मुहाने पर खड़ी हैं। नर्मदा नदी भी प्रदूषित हो चुकी है, लेकिन प्रदेश में अधिक इंडस्ट्री न होने के कारण नर्मदा अभी इतनी मैली नहीं हुई है। वहीं राज्य की चम्बल नदी को देश में सबसे स्वच्छ नदी का दर्जा प्राप्त है। हिमालय से लेकर केरल तक भारत की नदियां अपने अस्तित्व के लिए लड़ रही हैं। केरल की 21 नदियां, गुजरात की 20 जबकि बंगाल और कर्नाटक की 17 नदियां प्रदूषित हो चुकी हैं। सीवेज फीकल कोलिफोर्म देवभूनि की नदियों को भी निगल रहा है। उत्तराखण्ड और जम्मू कश्मीर की 9, हिमाचल प्रदेश की 7 जबकि उत्तर प्रदेश की 12 नदियां प्रदूषित पायी गयीं।

केन्द्र ने राज्यों को दी करोड़ों की राशि, 346 प्रोजेक्टों में केवल 158 ही हुए पूरे

केन्द्र सरकार ने नमामि गंगे मिशन के तहत राज्यों को 2014 से लेकर 30 जून 2021 तक करोड़ों की धनराशि आवंटित की है।
उत्तराखण्ड 1001.76 करोड़
उत्तर प्रदेश 3535.61 करोड़
बिहार 2,631.75 करोड़
दिल्ली 848.86 करोड़
एमपी के जबलपुर में पर्यावरण प्लानिंग के लिए 9.89 करोड़
राजस्थान के कोटा में अर्बन इंम्प्रूवमेंट ट्रस्ट के लिए 20 करोड़

2014 से लेकर 2021 तक भारत सरकार ने इन 11 राज्यों को कुल 10,248.46 करोड़ रुपए की धनराशि प्रदान की है। वहीं राज्यों में केन्द्र के प्रोजेक्टों की बात की जाए तो 10 से अधिक राज्यों में 346 प्रोजेक्टों को शुरू किया जाना था, जिनमें अब तक 158 को ही पूरा किया जा सका है। देवभूमि उत्तराखण्ड में 59 में से 45 प्रोजेक्टों को पूरा किया गया है। वहीं यूपी में 104 में सिर्फ 45 पर काम हो सका है। दिल्ली में भी 12 में से केवल 2 को ही पूरा किया जा सका है। राजस्थान में एक सरकार ने केवल प्रोजेक्ट दिया है, जो अभी पूरा नहीं हो सका है। देश के अन्य राज्यों में कुल 39 परियोजनाओं में से सिर्फ 11 पर ही काम हुआ है।

ये पांच नदियां हैं सबसे अधिक प्रदूषित
वर्ल्ड वाटर वीक की रिपोर्ट में भारत की पांच नदियों को सबसे प्रदूषित नदियां बताया गया है।
1.गंगा
2. यमुना
3. ब्रम्हपुत्र
4. दामोदर
5. बागमती (कोसी)

एनआरसीपी के तहत भी जारी की गयी करोड़ों की राशि
जिस तरह नमामि गंगे जैसी महत्वाकांक्षी योजना पर करोड़ों रुपए खर्च किए गए, ठीक उसी प्रकार राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना (NRCP) के लिए करोड़ों की राशि आवंटित की गयी। साथ ही जल संसाधन, नदी विकास और गंगा कायाकल्प (MOWR) पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय (MDWS) के साथ गंगा के पास के गांवों में स्वच्छता परियोजनाओं की देखभाल कर रहा है। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने अब तक एनआरसीपी के तहत विभिन्न प्रदूषण उपशमन परियोजनाओं और 2,446.24 मिलियन लीटर प्रतिदिन (एमएलड़ी) क्षमता के एसटीपी के कार्यान्वयन के लिए 2,066.98 करोड़ रुपए की राशि अवंटित की है। वहीं मार्च 2017 तक, तकरीबन 7000 करोड़ रुपए केवल गंगा की निर्मलता के लिए ही खर्च कर दिए गए।

वहीं 2019 में लोकसभा में पर्यावरण राज्य मंत्री बाबुल सुप्रियो ने बताया, कि एनआरसीपी के तहत स्वीकृत कुल 5,870 करोड़ में राज्यों को 2,522 रुपए जारी किए गए हैं। लोकसभा में पूछे गए एक प्रश्न के उत्तर में राज्य मंत्री ने जबाव देते हुए बताया, कि 16 राज्यों के 77 शहरों में 34 नदियों को प्रदूषण को कम करने के लिए ये राशि जारी की गयी है। साथ ही उन्होंने बताया एनआरसीपी के जरिए 9 राज्यों में प्रदूषण की गंभीरता को देखते हुए 141 करोड़ रुपए आवंटित किए गए हैं। जबकि NRCP के तहत ही महाराष्ट्र की पांच नदियों के प्रदूषण को कम करने के लिए 28 मार्च 2022 तक 1182.86 करोड रुपए जारी किए गए हैं। इन प्रदूषण उपशमन योजना के तहत कृष्णा, पंचगंगा, गोदावरी, तापी और मुला, मुधा नदी की देखभाल की जाएगी।

एनआरसीपी के तहत बजट 2018-2021 में राज्यों की नदियों को जारी राशि
आन्ध्र प्रदेश गोदावरी (21.78, 259.80,30.00 करोड) रुपए
तेलंगाना गोदावरी और मुसी नदी (345.70, 621.46)
मध्य प्रदेश वैनगंगा, नर्मदा और ताप्ती ( 20.16, 12.46, 7.95)
उत्तर प्रदेश गंगा, यमुना, काली गोमती, सत्यु, राम गंगा (10523.50, 399.50)
प. बंगाल, गंगा, दामोदार, बांका (3885.50, 109.50)
राजस्थान चंबल (258.48, 30.00)