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प्रकृति के संरक्षण के साथ अर्थ-व्यवस्था को मजबूत बनाना जरूरी – शिवराज

इंडियन इकॉनामिक एसोसिएशन का वार्षिक अधिवेशन

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प्रकृति के संरक्षण के साथ अर्थ-व्यवस्था को मजबूत बनाना जरूरी - शिवराज

प्रकृति के संरक्षण के साथ अर्थ-व्यवस्था को मजबूत बनाना जरूरी - शिवराज

भोपाल। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि अर्थशास्त्रियों के लिए यह विचारणीय है कि हम प्रकृति के संरक्षण के साथ अर्थ-व्यवस्था को मजबूत बनाने की विधियों पर कार्य करें। अर्थ-व्यवस्था की दिशा ऐसी होना चाहिए कि हम पृथ्वी भी बचा पाएँ और धरती पर सुखी समाज देखें। अर्थ के बिना दुनिया चल नहीं सकती। साथ ही अर्थ का अभाव व्यक्ति और राष्ट्र के लिए अच्छा नहीं माना गया है। भारत में उत्पादन, वितरण और उपभोग में सामंजस्य एवं संतुलन बनाने और दोषपूर्ण माध्यमों से अर्थ का उपार्जन न करने के दर्शन को आज नहीं तो कल विश्व भी स्वीकार करेगा। व्यक्ति के साथ ही सामाजिक जीवन में भी अर्थ का महत्व है। विकास दर बढ़े, इससे किसी को आपत्ति नहीं। हमें संसाधनों के समान वितरण और असमानता की खाइयों को खत्म करना पड़ेगा। इंडियन इकोनामी एसोसिएशन के राष्ट्रीय अधिवेशन के मौके पर मुख्यमंत्री ने यह बात कही।

अटल बिहारी वाजपेयी सुशासन एवं नीति विश्लेषण संस्थान के उपाध्यक्ष अर्थशास्त्री सचिन चतुर्वेदी ने कहा कि यह संगोष्ठी अर्थ-व्यवस्था के महत्वपूर्ण पहलु पर चिंतन का माध्यम है। कोरोना की परिस्थितियों के पश्चात विश्व में नवीन आर्थिक संभावनाओं को सभी देख रहे हैं। आज हम 5.9 इकोनोमिक ग्रोथ की आशा कर रहे हैं। साथ ही जो क्षेत्र कोविड से अधिक प्रभावित हुए उनको पुन: सक्षम बनाने के प्रयास हो रहे हैं। इनमें होटल, हॉस्पिटेलिटी, पर्यटन और उद्योग सेक्टर शामिल हैं। मध्यप्रदेश की ताकत यहां कार्य कर रहे स्व-सहायता समूह भी हैं। इस मौके पर आयईए के प्रो. वीके मल्होत्रा, डीके मदान और अन्य पदाधिकारी उपस्थित थे। मदान ने संगोष्ठी के उद्देश्यों पर प्रकाश डाला।

मध्यप्रदेश अब बीमारु नहीं सुचारु राज्य
कॉन्फ्रेंस प्रेसिडेंट इंडियन इकानामिक एसोसिएशन और नीति आयोग के सदस्य प्रो. रमेश चंद्र ने कहा कि मध्यप्रदेश किसी समय बीमारू राज्य था, लेकिन अब यह सुचारू राज्य है। इसमें सुशासन सहायक है, जो मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की नेतृत्व क्षमता से सम्भव हुआ है। प्रो. रमेश चंद्र ने कहा कि कृषि, सिंचाई के क्षेत्र में किए गए सुधार, किसानों को समर्थन मूल्य पर उपज खरीदने की सुविधा और भावांतर जैसे साधनों को अपनाने से मध्यप्रदेश की विकास दर में वृद्धि हुई। प्रदेश में कृषि को नजरअंदाज नहीं किया गया बल्कि अर्थ-व्यवस्था का आधार बनाया गया।