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सावधान ! सोशल मीडिया एडिक्ट हो रहे बच्चे, फेवरेट इंफ्लूएंसर्स से मिलने के लिए छोड़ रहे घर

  सर अच्छा पढ़ाते हैं, इसलिए पटना से मिलने भोपाल चला आया

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भोपाल। आजकल बच्चे अपना अधिकांश समय किसी न किसी डिजिटल माध्यम पर ही बिता करते हैं। दरअसल पिछले दो सालों से बच्चों की पढ़ाई-लिखाई डिजिटल माध्यम से होने के कारण वे उनके जीवन का हिस्सा बन गए। ऐसे में उनका रुझान आनलाइन गेमिंग की ओर भी बढ़ता गया। हमारे मासूम इसके शिकंजे में आते गए। हालांकि ऐसा भी नहीं है कि आनलाइन पढ़ाई के बाद ही बच्चे इसके शिकंजे में आए, लेकिन इसके बाद इस तरह के बच्चों की संख्या बेतहाशा बढ़ गई।

वहीं अब बच्चों में बढ़ती ऑनलाइन एक्टिवटी के कारण अब परिवार की शांति भंग हो रही है। सोशल मीडिया से प्रभावित होकर बच्चे अजीब हरकत कर रहे हैं। चाइल्ड लाइन में हर महीने 15 से 20 शिकायतें पहुंच रही हैं। बच्चे अपने फेवरेट इंफ्लूएंसर्स (प्रभावशाली व्यक्ति) की कॉपी करते हैं। मोबाइल लेने पर गुस्से में घर से भाग जाते हैं। ताजा मामला बिहार से है। वहां का किशोर एक ब्लॉगर से इतना प्रभावित हुआ कि उससे मिलने भोपाल आ पहुंचा। पटना निवासी 8वीं का छात्र बागमुगलिया के ब्लॉगर की ऑनलाइन क्लासेस लेता था। ब्लॉगर ने इसकी जानकारी चाइल्ड लाइन को दी। काउंसिलिंग में बच्चे ने बताया कि सर बहुत अच्छा पढ़ाते हैं, इसीलिए मिलने चला आया।

किशोर पूरी रात खेलता है ऑनलाइन गेम

केस 01

भोपाल में चूनाभट्टी क्षेत्र निवासी मां अपने 13 साल के बेटे की ऑनलाइन गेम पब्जी की लत से परेशान है। बच्चा पूरी रात गेम खेलता है। मोबाइल छीन लेने पर वह खुद को नुकसान पहुंचाने की कोशिश करता है।

केस 02

सोशल मीडिया पर रील्स देखने की लत से परेशान मां-बाप ने बच्चे से मोबाइल छीन लिया। पिता ने कहा- खुद कमाओ, तब फोन खरीद लेना। उज्जैन का 15 साल का बच्चा इसी बात पर घर छोड़कर भोपाल कमाने आ गया।

कहीं परवरिश में कमी तो नहीं

मनोचिकित्सक डॉ.उमा भट्टाचार्य कहती हैं कि ये बच्चों की गलती नहीं है। इसे खराब परवरिश का नतीजा माना जा सकता है। इसलिए अभिभावक खुद अपना गैजेट बिहेवियर ठीक करें। खाने-सोने और पढ़ाई के टाइम-टेबल की तरह मोबाइल चलाने का भी टाइम-टेबल बनाएं। तभी बच्चा मोबाइल की लत दूर होगी।

सिटी चाइल्ड लाइन की डायरेक्टर अर्चना सहाय के अनुसार हर महीने 15 से 20 केस आ रहे हैं। इनमें बच्चों में मोबाइल की लत की वजह से परिवार परेशान हैं। मेरा मानना है कि परिवार और स्कूल दोनों को मिलकर बच्चों को साइबर एजुकेशन देनी चाहिए।