
कांग्रेस की ये है नई रणनीति! चुनाव में जीत के लिए अपनाएगी ये फार्मूला...
भोपाल। मध्यप्रदेश में लंबे समय से सत्ता से दूर बनी हुई कांग्रेस अब एक नए फार्मूले पर काम कर रही है। दरअसल जानकारों की माने तो कांग्रेस इस बार हर कीमत पर मध्यप्रदेश में अपना कब्जा चाहती है। जिसके चलते वह भाजपा को घेरने के लिए लगातार कोशिशों में जुटी हुई है।
राजनीति के जानकारों के अनुसार चुनाव में जीत के लिए पूरा दम लगा रही कांग्रेस अब MP में भी गुजरात फार्मूले को अपनाने जा रही है। बीजेपी के सियासी समीकरणों को झटका देने के लिए पार्टी ने नई रणनीति पर काम शुरु भी कर दिया है, जिसके जरिए पार्टी SC/ST और आदिवासी वोट बैंक को साधने का काम करेगी।
इसके अलावा मायावती द्वारा पिछले दिनों अपने उम्मीदवारों की 22 प्रत्याशियों वाली पहली लिस्ट जारी कर दी है। जिससे मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और बसपा के बीच गठबंधन की तकरीबन सारी उम्मीदें खत्म हो गईं। ऐसे में कांग्रेस भी मध्य प्रदेश में बसपा की काट और दलित मतों को साधने के लिए 'गुजरात मॉडल' को अपना रही है, ताकि 15 साल के सत्ता के वनवास को खत्म कर सके।
इधर, कांग्रेस को मिला MP का 'जिग्नेश मेवाणी'...
मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और बसपा के बीच गठबंधन की तकरीबन खत्म हो चुकी सारी उम्मीदों के बीच कांग्रेस को MP का 'जिग्नेश मेवाणी' मिल गया है।
सामने आ रही जानकारी के अनुसार कांग्रेस ने गुजरात में जिस तरह से जिग्नेश मेवाणी के जरिए राज्य में बीजेपी का कड़ा मुकाबला किया था, अब उसी तर्ज पर मध्य प्रदेश में दलित युवा नेता देवाशीष जरारिया को पार्टी ने अपने साथ मिला लिया है।
जरारिया ने प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ के नेतृत्व में कांग्रेस का दामन थाम लिया है। जरारिया को मध्य प्रदेश का 'जिग्नेश मेवाणी' भी कहा जाता है।
ऐसे में माना जा रहा है प्रदेश में सत्ता का वनवास खत्म करने में जुटी कांग्रेस अब दलित और आदिवासी वर्ग के युवा चेहरों का सहारा लेगी। इसके लिए पार्टी ने भाजपा के खिलाफ माहौल बना रहे युवा चेहरों पर दांव लगाने की तैयारी कर ली है।
पार्टी ने प्रदेश के सियासी माहौल गर्म करने वाले चर्चित चेहरों को अपने पक्ष में लाने की कवायद तेज कर दी है और इसकी जिम्मेंदारी पार्टी ने दिग्विजय सिंह को सौपी गई है।
दिग्विजय सिंह अब उन चेहरों के संपर्क में हैं, जो कि सूबे की सियासत में बीजेपी सरकार की मुश्किलें बढ़ाने का काम कर रहे हैं। बताया जाता है कि कांग्रेस पार्टी गुजरात पैटर्न की तर्ज पर तीन चेहरों को पक्ष में लाने की कोशिश में जुटी है। जिन तीन चेहरों पर कांग्रेस पार्टी दांव लगाने की तैयारी में है उनमें ये खास शामिल हैं...
- आदिवासी इलाकों में तेजी से पैठ बनाने वाले संगठन जयस के हीरालाल अलावा का नाम सबसे ऊपर है।
- दूसरे नंबर पर पार्टी के राडार पर अजाक्स के महासचिव देवाशीष झारिया है, देवाशीष झारिया युवाओं को जोड़ने का रिकार्ड बनाकर चर्चा में रहे हैं।
-तीसरे नंबर पर सीहोर के बुधनी में किसान और आदिवासियों के समर्थन में सरकार के खिलाफ आंदोलन छेड़ने वाले अर्जुन आर्य शामिल हैं।
जानिये कौन हैं देवाशीष जरारिया...
बसपा के साथ युवाओं को जोड़ने की कवायद देवाशीष जरारिया ने ही शुरू की थी। इसके अलावा पूर्व में वे ही सोशल मीडिया के जरिए बसपा के पक्ष में माहौल बनाने का काम वो करते थे, इतना ही नहीं बसपा समर्थक के रूप में पार्टी की बात टीवी डिबेट में भी रखते थे। और इन्हीं सब कार्यों के चलते जरारिया ने अपनी एक राजनीतिक पहचान बनाई।
दलित समुदाय काफी आहत...
देवाशीष जरारिया के संबंध में कहा जाता है कि उनके कांग्रेस में शामिल होने का मकसद मध्य प्रदेश की जनता को 15 साल के भाजपा के शासन से मुक्ति दिलाने के साथ ही दलित-आदिवासी को इंसाफ दिलाना है।
बताया जाता है कि उनका मानना है कि मध्य प्रदेश में बसपा के लोग भी चाहते हैं कि कांग्रेस के साथ गठबंधन हो ताकि राज्य में बीजेपी को सत्ता से बाहर किया जा सके। ऐसे में मायावती के अकेले चुनाव लड़ने के फैसले से दलित समुदाय काफी आहत है। बसपा के लोग भी इस बार भाजपा को सत्ता से बाहर करने के लिए कांग्रेस को वोट करेंगे।
ज्ञात हो कि देवाशीष जरारिया मध्य प्रदेश में दलित मुद्दों को लेकर आंदोलन करते रहे हैं। उनके पास दलित युवाओं की टीम राज्य के सभी जिलों में है। 2013 में जरारिया बसपा से जुड़े थे, इसके बाद से वे लगातार दलित मुद्दों और बसपा के लिए संघर्ष करते रहे हैं।
राजनैतिक विश्लेषक मानते हैं कि देवाशीष मध्यप्रदेश की राजनीति में दलित समाज का एक प्रमुख और स्वीकार्य चेहरा बन चुके हैं। मध्य प्रदेश में जहां दलित समुदाय की आबादी 15.6 फीसद है वहीं अनुसूचित जाति के लिए 35 विधानसभा सीटें आरक्षित हैं, ऐसे में देवाशीष का कांग्रेस से जुड़ना, कांग्रेस के लिए काफी सकारात्मक माना जा रहा है।
ऐसे समझें चुनावी गणित...
मध्य प्रदेश में तकरीबन 15 फीसदी दलित और 21 फीसदी आदिवासी मतदाता हैं। बसपा का मुख्य आधार दलित मतों पर है। ये खासकर उत्तर प्रदेश से सटी विधानसभा सीटों पर हैं। राज्य में 25 विधानसभा सीटें ऐसी हैं जहां बसपा जीत हार का फैसला करती है।
2013 में मध्यप्रदेश में बीएसपी ने 230 सीटों में से 227 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे। उस समय बसपा यहां 6.42 फीसदी वोट के साथ चार सीटें जीतने में सफल रही थी। जबकि राज्य में 75 से 80 सीटों पर बसपा प्रत्याशियों ने 10 हजार से ज्यादा वोट हासिल किए थे। 2013 के विधानसभा चुनाव में आदिवासियों के लिए आरक्षित 47 सीटों में से बीजेपी को 32 और कांग्रेस को 15 सीटें मिली थीं।
भाजपा और कांग्रेस के बीच 8.4 फीसदी वोट शेयर का अंतर था। बीजेपी को 165 सीटें और कांग्रेस को 58 सीटें मिली थीं। बसपा का आधार यूपी से सटे इलाकों में अच्छा खासा है। चंबल, बुंदेलखंड और बघेलखंड के क्षेत्र में बसपा की अच्छी खासी पकड़ है।
इस बार कांग्रेस बसपा के साथ गठबंधन करके चुनाव मैदान में उतरने की बात कही जा रही थी, लेकिन मायावती ने गठबंधन के कयासों पर पूर्णविराम लगा दिया है। इसके बावजूद कमलनाथ अभी बसपा के साथ गठबंधन की उम्मीद लगाए हुए हैं।
मध्य प्रदेश में आदिवासियों की आबादी 21 प्रतिशत से अधिक है। राज्य विधानसभा की कुल 230 सीटों में से 47 सीटें आदिवासी वर्ग के लिए आरक्षित हैं। इसके अलावा करीब 30 सीटें ऐसी मानी जाती हैं, जहां पर्याप्त संख्या में आदिवासी आबादी है।
Updated on:
26 Sept 2018 02:07 pm
Published on:
26 Sept 2018 01:59 pm
बड़ी खबरें
View Allभोपाल
मध्य प्रदेश न्यूज़
ट्रेंडिंग
