
कांग्रेस के वचन पत्र से मध्यप्रदेश में एक बार फिर से विधान परिषद को लेकर सुगबुगाहट तेज हो गई। वचन पत्र में वादा किया गया है कि राज्य में कांग्रेस सरकार बनते ही विधान परिषद गठन की प्रक्रिया शुरू करेंगे। विधानसभा के पहले ही सत्र में विधान परिषद के गठन को प्रस्ताव पास कर केंद्र को भेजेंगे। यह पहला मौका नहीं है, जब राज्य में विधान परिषद के गठन की बात घोषणा पत्र या वचन पत्र में कही गई है।
कांग्रेस ने 2018 के वचन पत्र में भी इस बिन्दु शामिल किया था, कमलनाथ सरकार अल्पमत में आ गई और परिषद का प्रस्ताव ठंडे बस्ते में चला गया। कांग्रेस की पहली सूची के साथ विरोध के सुर सुनाई दे रहे हैं, ऐेसे में परिषद का गठन असंतुष्टों को साधने के लिए बेहतर उपाय हो सकता है।
1966 में मिल चुकी है अनुमति
संविधान परिषद गठन के लिए वर्ष 1966 में मध्यप्रदेश को अनुमति मिल चुकी थी। तत्कालीन सरकार ने 4 अक्टूबर 1966 को विधान परिषद गठन का निर्णय लिया। कैबिनेट की अनुमति की स्वीकृति के साथ केन्द्र को प्रस्ताव भेजा। केन्द्र सरकार ने 23 दिसम्बर 1966 को मध्यप्रदेश में विधान परिषद के गठन के लिए अधिसूचना जारी कर दी। इसके लिए प्रक्रिया शुरू होने के पहले ही तत्कालीन सरकार ने अपना फैसला बदलते हुए 1 अगस्त 1967 को केन्द्र सरकार को पत्र लिख दिया। इसके लिए राज्य की वित्तीय स्थिति को आधार बताया गया। इस आधार पर केन्द्र सरकार ने 11 अगस्त 1967 को केन्द्र सरकार ने विधान परिषद के गठन की अधिसूचना निरस्त कर दी।
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क्या होती है विधान परिषद
देश में विधायिका द्विसदनीय प्रणाली व्यवस्था है. केंद्र स्तर पर जैसे लोकसभा और राज्यसभा होता है. उसी तरह राज्य स्तर पर विधानसभा और विधान परिषद का ढांचा है। अनुच्छेद 169 में विधान परिषद के बारे में विस्तार से बताया गया है। इसके तहत विधान परिषद होगी या नहीं, वह संसद पर निर्भर करेगा।
विधानसभा के पूर्व प्रमुख सचिव बीडी इसराणी कहते हैं कि विधान परिषद होनी चाहिए, यह संवैधानिक व्यवस्था भी है। परिषद में विषय विशेषज्ञ होते हैं, ऐसे में बेहतर कानून बनेंगे, इसका लाभ जनता को मिलेगा।
इन राज्यों में है विधान परिषद्
वर्तमान में आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, बिहार, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र में विधान परिषद है।
जानें कब क्या-क्या हुआ
● प्रदेश में विधान परिषद गठन के लिए 1956 में संविधान संशोधन किया गया। लेकिन राष्ट्रपति के हस्ताक्षर नहीं होने से यह अमल में नहीं आ पाया।
● 1996 में कवायद शुरू हुई थी, लेकिन वित्तीय हवाला से अटका।
● 1993 में कांग्रेस ने घोषणा-पत्र में विधान परिषद का उल्लेख किया। दिग्विजय सीएम बने, मामला ठण्डे बस्ते में ही रहा।
● वर्ष 1998, 2013 और 2018 में कांग्रेस ने घोषणा पत्र में शामिल किया। 2019 में कमलनाथ ने प्रक्रिया शुरू की, सरकार अल्पमत में आ गई।
76 सदस्यीय होगी विधान परिषद
संवैधानिक प्रावधान के तहत विधान परिषद में राज्य विधानसभा में सदस्य संख्या के अधिकतम एक तिहाई सदस्य हो सकते हैं। प्रदेश की विधानसभा में सदस्य संख्या 230 हैं, इसलिए विधान परिषद में सदस्यों की अधिकतम संख्या 76 हो सकती है। इसी सदस्य संख्या को देखते हुए सदस्यों के चुनाव और चयन की प्रक्रिया शुरू होगी।
13 करोड़ रुपए का सालाना खर्च
मध्यप्रदेश में 230 सीटों वाले विधानसभा पर सालाना 40.2 करोड़ रुपए खर्च आता है। विशेषज्ञों के मुताबिक प्रदेश में 76 सीटों वाला विधान परिषद का गठन होता है, तो उसमें 13 करोड़ रुपए का खर्च सालाना आ सकता है। परिषद की शुरुआत में यह खर्च होगा। इन्फ्रास्ट्रक्चर और सुरक्षा खर्च अलग से है।
भाजपा बोली- प्रस्ताव पहले से केंद्र के पास
विधान परिषद का प्रस्ताव पहले से केन्द्र के पास विचाराधीन है। यह केन्द्र का विषय है, कांग्रेस अपने वचन पत्र से लोगों को गुमराह कर रही है
-गिरीश गौतम, विधानसभा अध्यक्ष
Updated on:
20 Oct 2023 02:03 pm
Published on:
20 Oct 2023 02:00 pm
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