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राजस्थान के जयपुर से भोपाल आए ‘दशावतार भगवान विष्णु’, अप्रैल से देंगे भक्तों को दर्शन

जीहां आपने बिल्कुल सही पढ़ा है कि राजस्थान के जयपुर से दशावतार रूप में चलकर भगवान विष्णु मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल पहुंच गए। हालांकि उनकी यह यात्रा वर्षों पहले ही राजस्थान से एमपी आकर खत्म हो चुकी थी। लेकिन इन दिनों उनका दशावतार रूप चर्चा का विषय बना हुआ है। यहां जानें आखिर आज क्यों की जा रही है भगवान विष्णु के दशावतार रूप की इतनी चर्चा...

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दरअसल भगवान विष्णु के कई स्वरूपों में स्थापित प्रतिमाओं के मंदिर तो कई मिल जाएंगे। लेकिन उनके सभी दशावतार स्वरूपों को एक जगह देखना दुर्लभ है। प्रदेश की राजधानी भोपाल में इन दिनों उनके सभी दशवतार रूप उनके भक्तों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। वो भी इसलिए क्योंकि यहां स्थापित उनका दशावतार मंदिर अब पूरी तरह से बनकर तैयार हो चुका है। भक्तों को अब केवल उसके लोकार्पण का इंतजार है।

सभी दशावतार स्वरूपों का यह पहला मंदिर

भगवान विष्णु के सभी दशावतार स्वरूपों के साथ स्थापित यह राजधानी भोपाल में पहला मंदिर है। यह मंदिर संत नगर के बेहट गांव में बड़े तालाब के किनारे पर स्थापित है।

1995 में सबसे पहले पहुंचे थे लक्ष्मीनारायण

आपको बता दें कि भगवान विष्णु के सभी दशावतार स्वरूप का यह मंदिर भले ही आज लोकार्पण को लेकर चर्चा में है, लेकिन आपको बता दें कि यह मंदिर यहां एक मढ़िया के रूप में 1995 में अस्तित्व में आया था। हालांकि तब यहां जयपुर से केवल लक्ष्मीनारायण की प्रतिमा लाई गई थी और स्थापित की गई थी। लेकिन आज यह मढ़िया 51 फीट ऊंचे मंदिर के रूप तब्दील हो चुकी है। आज इस मंदिर को दशावतार मंदिर के साथ ही मनकामेश्वर सुखधाम मंदिर के नाम से जाना जाता है।

जयपुर के कलाकरों ने तैयार की प्रतिमाएं

यहां स्थापित पहली प्रतिमा भगवान विष्णु की लक्ष्मीनारायण की है। साढ़े तीन फीट ऊची यह प्रतिमा जयपुर में ही तैयार करवाई गई थी। वहीं फिर उनके सभी दशावतार स्वरूपों की प्रतिमाएं भी जयपुर के कलाकारों ने ही तैयार की थीं। फिर उन्हें यहां स्थापित किया गया। ये सभी प्रतिमाएं संगमरमर के पत्थर से बनी हुई हैं। विष्णु के ये दशावतार स्वरूप मत्स्य, कुर्म, वराह, नरसिंह, वामन, परशुराम, राम-कृष्ण, बुद्ध और कल्कि हैं।

2005 में शुरू हुआ पुनर्निर्माण

1995 में स्थापित होने के बाद इस मंदिर के पुनर्निर्माण के बारे में सोचा गया। फिर 2005 में पुनर्निर्माण कार्य शुरू किया गया।

एक करोड़ लागत का अनुमान

जानकारी के मुताबिक भगवान विष्णु के सभी दशावतारों के इस मंदिर के निर्माण की अनुमानित लागत 1 करोड़ रुपए है।

कोरोना काल में रुका कार्य

2005 में शुरू किया पुनर्निर्माण कार्य कोरोना काल में रुक गया। कोरोना काल के बाद 2021 से एक बार फिर मंदिर का पुनर्निर्माण कार्य शुरू किया गया। यानी बीच-बीच में रुकावट के बाद आखिरकार 2023 में मंदिर अपना संपूर्ण आकार ले चुका है।

बड़ी रोचक है मंदिर के अस्तित्व की कहानी

मंदिर कमेटी प्रमुख जयशंकर वाजपेयी ने बताया कि उनके पिता स्वर्गीय महेंद्र नारायण बाजपेयी और सोशल वर्कर लोकूमल आसवानी समेत उनके कुछ करीबी बेहटा गांव में मॉर्निंग वॉक पर जाते थे। इस गांव में उनकी जमीन भी थी। उसी दौरान उन्हें मंदिर का आइडिया आया। इसके बाद उन्होंने दानदाताओं के सहयोग से मंदिर का निर्माण शुरू किया गया। हर गुरुवार को होती है विशेष पूजा-अर्चना भगवान विष्णु का मंदिर होने के कारण यहां हर गुरुवार को विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। खासतौर पर विष्णु संकीर्तन किया जाता है। अप्रैल में गुड़ी पड़वा पर होगा लोकार्पण मंदिर समिति के मुताबिक नवसंवत्सर पर अप्रैल में गुड़ी पड़वा के दिन मंदिर का लोकार्पण किया जाएगा। इस अवसर मंदिर में हवन-पूजन का आयोजन किया जाएगा।

हर गुरुवार को होती है विशेष पूजा-अर्चना

भगवान विष्णु का मंदिर होने के कारण यहां हर गुरुवार को विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। खासतौर पर विष्णु संकीर्तन किया जाता है। अप्रैल में गुड़ी पड़वा पर होगा लोकार्पण मंदिर समिति के मुताबिक नवसंवत्सर पर अप्रैल में गुड़ी पड़वा के दिन मंदिर का लोकार्पण किया जाएगा। इस अवसर मंदिर में हवन-पूजन का आयोजन किया जाएगा।

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