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राज्य की डायरी: क्रिकेट हो या सियासत, जीत चेहरे-मोहरे से ही

भाजपा ने उम्मीदवारों की सूची जारी करने में मनोवैज्ञानिक बढ़त तो हासिल की, लेकिन आचार संहिता लगने से सरकारी आयोजनों के जरिए माहौल बनाने की उसकी योजनाएं धरी रह गईं। वहीं कांग्रेस ने भ्रष्टाचार-अत्याचार और जातिगत जनगणना सहित स्थानीय मुद्दों पर फोकस कर अपने इरादे जाहिर कर दिए हैं।

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भोपाल

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Manish Geete

Oct 12, 2023

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राज्य की डायरी : विजय चौधरी


भाजपा ने उम्मीदवारों की सूची जारी करने में मनोवैज्ञानिक बढ़त तो हासिल की, लेकिन आचार संहिता लगने से सरकारी आयोजनों के जरिए माहौल बनाने की उसकी योजनाएं धरी रह गईं। वहीं कांग्रेस ने भ्रष्टाचार-अत्याचार और जातिगत जनगणना सहित स्थानीय मुद्दों पर फोकस कर अपने इरादे जाहिर कर दिए हैं। प्रदेश में अब प्रशासन का ही इकबाल बुलंद है, आचार संहिता लगने के बाद असर भी दिखने लगा है। सरकारी आयोजनों के जरिए माहौल बनाने में जुटी रही भाजपा की तैयारियां धरी रह गईं। बीते 48 घंटे से पार्टी की सभी तरह की गतिविधि थम-सी गई हैं। राष्ट्रीय पर्यवेक्षक दिल्ली में ही जमे हैं तो राज्य नेतृत्व अपने ही गुणा-गणित में उलझा है। इसके मुकाबले कांग्रेस जमीनी हमले में जुट गई है। राहुल गांधी ने आदिवासी बाहुल्य विंध्य के ब्यौहारी (शहडोल) इलाके में बड़ी जनसभा कर मैदान मार लिया है।

यह पहला मौका था जब राहुल भाजपा और संघ पर हमलावर तो रहे, पर केंद्र व उसकी नीतियों को मुद्दा बनाने के बजाय प्रदेश के मुद्दों को तरजीह दी। भ्रष्टाचार व अत्याचार को हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया तो सीधी व शहडोल की हालिया घटनाओं को केंद्र में रखकर ही घेरा। जातिगत जनगणना को गारंटी से जोड़कर पार्टी ने जहां फोकस साफ रखा है, वहीं चुनावी मुकाबले को कमलनाथ बनाम शिवराज रखने की कोशिश में जुटी है। यही भाजपा की दु:खती रग भी है, जिसने शिवराज को चेहरा बनाने के बजाय पहले 'एमपी के मन में पीएम मोदी' का नारा दिया और अब पार्टी को ही चेहरा बता रही है। अब भाजपा की जो प्रचार-सामग्री सामने आई है, उसमें शिवराज मुख्य चेहरा नहीं हैं।

केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल यह बात सार्वजनिक रूप से कह भी चुके हैं। सबकी निगाह अब इस पर है कि प्रचार में मप्र सरकार की जन कल्याणकारी योजनाओं को कितनी तवज्जो मिलेगी? दिलचस्प होगा यह देखना कि करीब चार माह से जिस लाड़ली बहना योजना के सहारे शिवराज पूरे प्रदेश में जोर-शोर से सभाएं कर रहे थे, उस योजना को प्रचार अभियान में कितनी जगह मिलती है? ये प्रश्न हवा में आ गए हैं क्योंकि पीएम मोदी की बीती दो-तीन सभाओं में केंद्र की योजनाओं व कामों का जिक्र तो हुआ, पर प्रदेश की बात शून्य पर ही टिक गई। स्वाभाविक सत्ता विरोधी लहर का अंदाजा भाजपा को है, 2018 में शिवराज सरकार के 13 मंत्री चुनाव हार गए थे। जिससे पार्टी बहुमत से दस कदम दूर ही ठिठक गई थी।


सत्ता विरोधी लहर को बेअसर करने के लिए पार्टी कितनी संजीदा है, इसकी झलक टिकट वितरण की शुरुआत में ही मिल गई थी। भाजपा तीन सूचियों तक चौंकाती रही। इससे घोर अनिश्चितता की स्थिति बन गई थी, पार्टी के भीतर चर्चा चल पड़ी थी कि जाने किसका टिकट कट जाए। बगावत की लपटों ने पार्टी को नीचे से ऊपर तक झकझोर दिया। चौथी सूची तक आते-आते जोखिम उठाने का दम जाता रहा। मंत्रियों का नम्बर आते ही पांव पीछे खींच लिए और एक झटके में 25 मंत्रियों को उतारकर सभी कुहासे छांट दिए। नौ मंत्री अभी भंवर में हैं। कयास हैं कि इन पर सत्ता विरोधी रुझान की कैंची चल सकती है। भाजपा नेतृत्व को लेकर अजीब दुविधा में फंसती दिख रही है। जिन चेहरों को लेकर वह भ्रम की शिकार है, उन्हें ही मैदान दे दिया है। कोई चेहरा तय न होने से हर कोई सीएम की दावेदारी में जुटा है, इससे कार्यकर्ता बंटने लगे हैं। भाजपा को समझना चाहिए कि पिच क्रिकेट की हो या सियासत की, मैच खिलाड़ी के दमखम से ही जीते जाते हैं।