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mp election 2023: इस बार के चुनाव में सबसे ज्यादा ब्राह्मण, ठाकुर, ओबीसी

mp election 2023 कांग्रेस ने 47 प्रतिशत तो भाजपा ने 56 प्रतिशत उतारे सवर्ण और ओबीसी प्रत्याशी

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भोपाल

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Manish Geete

Oct 24, 2023

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मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 230 और भाजपा ने 228 सीटों पर उम्मीदवार घोषित किए हैं। कांग्रेस ने अपने वचन पत्र में सरकार बनने पर जातिगत जनगणना कराने की गारंटी दी। राहुल गांधी भी आबादी के अनुसार आरक्षण देने के लिए आवाज उठाते रहे हैं। कांग्रेस का दावा है कि उसने चुनाव में सभी जातियों को प्रतिनिधित्व दिया है। भाजपा का भी दावा है कि उसने भी जातीय संतुलन का ध्यान रखा है। पत्रिका ने जब सूची का एनालिसिस किया तो सामने आया कि कांग्रेस ने 47.59 फीसदी ब्राह्मण, ठाकुर और ओबीसी को टिकट दिया है। दूसरी ओर भाजपा ने 56.14 प्रतिशत ब्राह्मण, ठाकुर और ओबीसी को मैदान में उतारा है।

कांग्रेस: भाजपा के वोट में सेंध की कवायद: कांग्रेस ने सामान्य वर्ग को 86, ओबीसी को 59 टिकट दिए हैं। अनुसूचित जनजाति को 48 और अनुसूचित जाति को 34 टिकट दिए हैं। माना जाता है ब्राह्मण, जैन और बनिया समुदाय भाजपा के पक्ष में वोटिंग करता है। कांग्रेस ने इस बड़े वर्ग को साधने के लिए प्रदेश के हर अंचल में टिकट दिए हैं। कांग्रेस ने सामान्य जाति के जिन 86 उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है, उनमें 29 ब्राह्मण और 31 ठाकुर हैं। वहीं, 10 उम्मीदवार जैन समुदाय से भी हैं।

राजनीतिक विश्लेषक गिरिजा शंकर के अनुसार हर समुदाय चाहता है उसका ज्यादा से ज्यादा प्रतिनिधित्व हो। दोनों ही पार्टियों ने जातियों के राजनीतिक गुणा-भाग के आधार पर टिकट दिए हैं, लेकिन बागी यह गणित बिगाड़ सकते हैं। जिन निर्दलीय उम्मीदवारों का वर्चस्व होगा, वो पार्टी के वोट काटेगा। वैसे भी हर समाज को मांग के आधार पर टिकट देना संभव नहीं है।


भाजपा: क्षेत्रवार संतुलन

भाजपा ने क्षेत्रवार जातीय संतुलन साधने की कोशिश की है। भाजपा ने 228 उम्मीदवारों में से सामान्य के 78, ओबीसी के 69, एससी के 34 और एससी के 47 उम्मीदवारों को टिकट दिए हैं। भाजपा ने ब्राह्मण, ठाकुर और ओबीसी के मामले में कांग्रेस की तुलना में 8.55 फीसदी ज्यादा टिकट दिए हैं। जानकारों का कहना है, भाजपा ने अपने कोर वोटर को बरकरार रखने के लिए ऐसा किया है।


जाति कांग्रेस भाजपा

ब्राह्मण: 29 30
ठाकुर: 31 29
अहिरवार: 14 08
गुर्जर: 08 04
मीणा: 02 03
कुशवाह: 03 04
धाकड़: 03 03
चौरसिया: 01 00
लोधी: 07 11
यादव: 07 07
बनिया: 05 06
कुर्मी: 08 05
जैन: 07 07
कलार: 03 05
पंजाबी: 03 00
खटीक: 05 10
कोरी: 01 00
गोंड: 22 22
दांगी: 01 02
तंवर: 01 00
सोंधिया: 01 03
वाल्मिकी: 01 00
कायस्थ: 02 01
परधान: 03 02


जाति कांग्रेस भाजपा

मरार: 01 01
पवार: 03 03
सिंधी: 03 02
सखवार: 01 00
कोल: 01 01
प्रजापति: 02 00
साहू: 02 00
सोनार: 01 00
कौरव: 01 01
रघुवंशी: 02 02
कुनबी : 02 03
पासी: 02 00
जाट: 01 03
कतिया: 01 01
बलई: 06 05
खाती: 04 03
कोरकू: 02 03
भील: 09 08
बारेला: 02 04
भिलाला: 09 07
कोल्टा: 02 00
राजपूत: 01 00
बागड़ी: 01 03

भाजपा में ये जातियां भी

जाति संख्या

गोस्वामी: 02
बराबर: 01
सिख: 01
नट: 01
खंगार: 01
कुम्हार: 01
तेली: 02
महार: 04
विश्नोई: 01
परमार: 01
पाटीदार: 02
मेघवाल: 01

अन्य पिछड़ा वर्ग को 59 टिकट दिए

सरकार की एक रिपोर्ट के अनुसार, मप्र में अनुसूचित जाति (एससी) की आबादी 15.6त्न व अनुसूचित जनजाति (एसटी) की आबादी 21.1त्न और ओबीसी की कुल आबादी 50.09 प्रतिशत है।

इधर, समाज भी सीट वितरण से खुश नहीं

मप्र कुशवाह समाज के प्रदेश अध्यक्ष योगेन्द कुशहवा का कहना है, सभी दल ओबीसी को आबादी के अनुपात में टिकट वितरण का दावा रहे थे। प्रदेश में ओबीसी आबादी करीब 54त्नहै, इस हिसाब से 126 सीटों पर टिकट देना थी। लेकिन किसी दल ने इस अनुपात में टिकट नहीं दिए। हर जाति को तो प्रतिनिधित्व का मौका ही नहीं मिला। वहीं, मप्र मालवीय रजक समाज संघ के प्रदेश अध्यक्ष नरेन्द्र मालवीय का कहना है, प्रदेश में समाज की दो लाख से ज्यादा आबादी है। चुनाव से पहले दोनों दलों से हमने रायसेन, बैरसिया, आष्ठा, सीधी सहित 6 सीटों से टिकट की मांग की थी, लेकिन दोनों ही पार्टियों ने ध्यान नहीं दिया। समाज को उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिला।

कांग्रेस के रामगरीब आदिवासियों को करेंगे लामबंद

दो बार के विधायक और रीवा राजघराने के युवराज दिव्यराज सिंह को भाजपा ने और कांग्रेस ने आदिवासी प्रत्याशी और पूर्व विधायक रामगरीब कोल को टिकट दिया है। यहां कांग्रेस ने एक साथ जिले की सभी 6 जिलों को फोकस किया है। यहां बसपा से बीडी पांडेय हैं। अन्य प्रत्याशी लक्ष्मण तिवारी भी मैदान में हैं। ऐसे में भाजपा व अन्य दलों के सवर्ण प्रत्याशी उतारने से क्षेत्र में ब्राह्मण और ठाकुर वोटों पर निशाना साधा। इसे देखते हुए कांग्रेस ने आदिवासी नेता कोल को उतारकर वोटों को समेटने की कोशिश की है। इसे सिरमौर और त्योंथर पर जीत सुनिश्चित करने का ठोस तरीका माना जा रहा है।