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अतीत का झरोखा: नोटों से भरा सूटकेस लेकर विश्राम भवन में बैठ गए गोविंद

दल-बदल का पहला सबसे बड़ा खेल !

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bhasan

अतीत का झरोखा: नोटों से भरा सूटकेस लेकर विश्राम भवन में बैठ गए गोविंद

वाकया 1967 का है, तब डीपी मिश्रा की कांग्रेस सरकार बदलने के लिए ये दल-बदल का पहला सबसे बड़ा खेल खेला गया था। इसकी पटकथा राजमाता ने लिखी थी, पर मुख्य पात्र गोविंद नारायण सिंह थे।

गोविंद नारायण सिंह के निर्देशन में रातोंरात 36 विधायकों को अपने पाले में लिया गया। साम, दाम, दंड, भेद अपनाया गया। जो विधायक जिस तरीके से अपने पाले में आया उसे लाया गया था। गोविंद नारायण सिंह विश्राम भवन में नोटों से भरा सूटकेस लेकर बैठ गए थे।

जो राजी खुशी आ रहे थे तो ठीक, जो नहीं आ रहे थे तो गोविंद अपने लोगों से उन्हें पकडऩे के लिए चिल्ला-चिल्लाकर निर्देश देते थे। हालात तो यहां तक बन गए थे कि छतरपुर के एक विधायक ने विधानसभा अध्यक्ष को यह लिखित शिकायत कर दी थी कि विधायक विश्राम गृह के ब्लॉक 2 से उन्हें रात को गोविंद नारायण जबरन उठाकर ले गए और दल बदलने के कागज पर दस्तखत करने मजबूर किया।

लगभग 36 विधायकों को हाईजैक किया गया। सभी को भोपाल के आलीशान होटल में रखा गया। इसके बाद राजमाता ने इन्हें अपने पाले में सुरक्षित रखने के लिए ग्वालियर से बसें बुलवाई और अपनी सुरक्षा में उन्हें ग्वालियर भिजवाया।

कांग्रेस को भी इस खेल की भनक लग गई थी। उसने भी विधायकों को बचाने का प्रयास किया था। 10 लोगों को सुरक्षित कर पाने में सफल भी रही। ग्वालियर पहुंचे इन विधायकों को बाद में दिल्ली भेजा गया।

कुछ दिन बाद वापस भोपाल लाया गया। इन्हीं विधायकों के दम पर विश्वास मत के दौरान कांग्रेस की सरकार गिराई गई।

ऐसी की तैसी यानी यथा प्रस्तावित
गोविंद नारायण मुख्यमंत्री तो बन गए, लेकिन राजमाता सिंधिया और जनसंघ का दखल काफी रहा। आत्माभिमानी गोविंद नारायण को यह बात चुभने लगी थी।

एक फाइल राजामाता की ओर से गोविंद नारायण के पास पहुंची। इसमें उन्होंने फाइल में ही लिख दिया ऐसी की तैसी। बात राजमाता तक गई, लेकिन गोविंद नारायण ने जवाब दिया कि इसका मतलब है 'ऐज प्रपोज्ड' अर्थात यथा प्रस्तावित।
(जैसा वरिष्ठ पत्रकार केजी गुप्ता ने सतना के रमाशंकर शर्मा को बताया।)