
आखिर सियासत के 'आडवाणी' क्यों बनें बाबूलाल गौर और सरताज
भोपाल। मध्यप्रदेश भाजपा को विधानसभा चुनाव के उम्मीदवारों की सूची जारी करने में पसीना आ रहा है। चौतरफा विरोध के बीच में पार्टी के दिग्गज नेता बाबूलाल गौर और सरताज सिंह ने बगावत का झंडा बुलंद कर दिया है। दोनों ने साफ कर दिया है कि भाजपा से टिकट मिले या न मिले चुनाव जरूर लड़ेंगे।
निर्दलीय उतरने की क्यों दे रहे चुनौती ...
सवाल ये है कि कुशाभाऊ ठाकरे के ये अनुशासित शिष्य बगावत पर क्यों उतर आए? आखिर क्यों मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से लेकर सभी की मान-मनुहार को दरकिनार कर रहे हैं। जिन दोनों नेताओं ने संगठन के एक बार कहने पर मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया, वे चुनाव मैदान में निर्दलीय उतरने की चुनौती क्यों दे रहे हैं?
उम्रदराज नेताओं से किनारा.....
भाजपा ने उम्रदराज नेताओं को किनारे करने की शुरुआत लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी से की थी। प्रदेश में उम्रदराजों की तलाश हुई तो तीन मंत्रियों के नाम सामने आए। बाबूलाल गौर, सरताज सिंह और कुसुम महदेले।
प्रदेश प्रभारी विनय सहस्रबुद्धे आनन—फानन में आए और तत्कालीन प्रदेश भाजपा अध्यक्ष नंदकुमार चौहान के साथ सीधे गौर और सरताज के घर गए और मंत्री पद से इस्तीफा लेकर आ गए। दोनों ने चुपचाप इस्तीफा दे दिया। कुसुम के लोधी वोटों में दखल को देखते हुए भाजपा उनका इस्तीफा लेने की हिम्मत नहीं जुटा पाई।
सब ने किया अनसुना....
उनकी खामोशी तब टूटी, जब पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने अपने भोपाल दौरे के दौरान कहा- पार्टी में 75 साल का कोई फॉर्मूला नहीं है। बस दोनों बुजुर्ग नेताओं ने हल्ला बोल दिया, लेकिन प्रदेश भाजपा से लेकर मुख्यमंत्री तक ने अनसुना कर दिया।
इसके बाद उनकी संगठन में उपेक्षा शुरू हो गई। इसके बाद ये आशंका बलवती हो गई कि ये दोनों बुजुर्ग नेता दिन देखकर हमलावर जरूर होंगे। गौर और सरताज ने कई बार कहा कि पार्टी के लिए पूरा जीवन दिया, लेकिन हमें दूध की मक्खी की तरह फेंका जाएगा इसकी कल्पना भी नहीं की थी।
मुख्यमंत्री रहे निशाने पर....
दोनों नेताओं के निशाने पर सीधे मुख्यमंत्री रहे। वजह भी साफ थी, दोनों की रवानगी में मुख्यमंत्री की भूमिका अहम मानी गई। उनके इस निर्णय को अपने गले ओढऩे वाला कोई था भी नहीं। मुख्यमंत्री ने जब भी कड़वे फैसले लिए, उन्हें ओढऩे के लिए किसी न किसी नेता को आगे किया, लेकिन गौर-सरताज का मामला इसका अपवाद साबित हुआ।
आज जब भाजपा मुश्किल दौर से गुजर रही है। बागियों ने खुद का इकबाल बुलंद कर रखा है..ऐसे में इन दोनों नेताओं ने भी खामोशी के साथ 'आडवाणी' बनने से इनकार कर दिया है। इसकी वजह भी है। भाजपा ने उम्र के नाम पर दूसरे लोगों को घर बैठाया, लेकिन टिकट उनके घर के भीतर ही दे दिए।
मसलन, मेहरबान सिंह रावत को घर बैठाया तो उनकी बहू को टिकट दे दिया। गौरीशंकर शेजवार का टिकट काटा तो उनके बेटे मुदित को दे दिया। हर्ष सिंह का टिकट काटकर उनके बेटे को दिया। ऐसे में बाबूलाल गौर अपनी बहू की वकालत क्यों नहीं करेंगे?
सरताज भी यही चाहते हैं कि राजनीति से विदाई इस तरह से तो न की जाए। यही वजह है कि जब नरेंद्र सिंह तोमर ने उन्हें मनाने के लिए फोन किया तो उनका जवाब तल्ख था। हालांकि, मध्यप्रदेश में बुजुर्ग नेताओं को विदा करने की यह परंपरा भी नहीं रही।
खामोश नहीं रहेंगे....
भाजपा में ही देखें तो सुंदरलाल पटवा, लक्ष्मीनाराण शर्मा, कैलाश सारंग से लेकर कैलाश जोशी तक की लंबी फेहरिस्त है, बड़े नेता जब सक्रिय राजनीति से विदा हुए तो उनकी राजनीति उनके बेटों और घर के भीतर ही संभला दी गई। ऐसे में ये दोनों अजातशत्रु भला क्यों खामोशी से विदा हो जाएं।
राजनीति में 'आडवाणी' होने का मतलब है, खामोशी के साथ राजनीति के नेपथ्य में जीवन जीना। ऐसे में दोनों नेताओं के विरोध ने साफ कर दिया है कि वे खामोश नहीं रहेंगे।
Updated on:
06 Nov 2018 08:43 am
Published on:
06 Nov 2018 08:41 am
