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भोपाल में 25 गुना महंगा इलाज, 4 रुपए का कैन्यूला मिल रहा 160 रुपए में, कंज्यूमेबल्स पर मुनाफे का खेल

Government medicines: सरकार दवाओं के मार्जिन पर नियंत्रण रखती है, लेकिन अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाले कंज्यूमेबल्स (जैसे IV कैन्यूला) की MRP पर नहीं। इससे निजी अस्पतालों में मरीजों से भारी मुनाफा वसूला जाता है।
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भोपाल

•

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Astha Awasthi

•

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Sunil Mishra

•

Oct 21, 2026

सरकारी दवाएं, प्रतिकात्मक फोटो (Photo Source- magnific)

सरकारी दवाएं, प्रतिकात्मक फोटो (Photo Source- magnific)

Bhopal news: सरकार दवाओं के व्यापार मार्जिन सीमा तय कर रेट तो नियंत्रित कर रही है, लेकिन अस्पतालों में भर्ती मरीजों के इलाज में सबसे ज्यादा उपयोग किए जाने वाले कंज्यूमेबल्स के रेट पर नियंत्रण नहीं कर रही। इनकी एमआरपी कई गुना बढ़ाकर लिखी जा रही है। अस्पतालों में मरीजों को यह कंज्यूमेबल्स एमआरपी पर या लगभग 10% डिस्काउंट पर बेचे जा रहे हैं। 'स्वाथ्य' में मुनाफे के 'रावण' से मरीज लुट रहे हैं। इनके वास्तविक रेट और मरीजों को दिए जाने वाली कीमतों में 10 से 25 गुना तक मुनाफा कमाया जा रहा है।

पत्रिका ने सरकारी अस्पतालों में कंपनियों के लिए मप्र पब्लिक हेल्थ सर्विसेज कॉपॅर्पोरेशन की तय दरों को आधार बनाकर पड़ताल की तो भयावह स्थिति सामने आई। यही कंपनियां जहां सरकारी अस्पतालों में आइवी कैन्यूला 4.18 रुपए में सप्लाई करती हैं, वहीं निजी अस्पतालों में इस आइवी कैन्यूला के लिए 160 से 180 रुपए तक वसूले जा रहे हैं।

अस्पतालों में इतनी लूट क्यों...

जानकारों का कहना है कि मप्र पब्लिक हेल्थ सर्विसेज कॉर्पोरेशन से फार्मा कंपनियां न्यूनतम रेट पर कॉन्ट्रैक्ट करता है। लेकिन इस दर पर भी कंपनियां मुनाफा नहीं छोड़तीं। इन दरों में भी उनका मुनाफा शामिल हैं। लेकिन अस्पताल में भर्ती मरीजों के लिए इतनी भारी-भरकम कीमतें क्यों रखी जा रही हैं?

अस्पताल में घुसते ही लूट शुरू

जब कोई मरीज अस्पताल में भर्ती होता है तो सबसे पहले उससे आइवी सेट, आइवी कैन्यूला, डिस्पोजेबल सिरिंज, कैथेटर, सैनिटाइजर आदि मंगवाए जाते हैं। कंपनियां इन उत्पादों पर एमआरपी लिखती हैं। वे अपना मुनाफा जोड़कर डिस्ट्रीब्यूटर को उत्पाद देती हैं और डिस्ट्रीब्यूटर लगभग 40-50 फीसदी तक मुनाफा लेकर सामान बेचता है। इसके बाद मरीज को एमआरपी या 5-10% छूट के साथ बेचा जाता है। इससे सामान कई गुना महंगे हो जाते हैं।

कंपनी के साथ बदल जाती हैं दरें

कंज्यूमेबल्स में भी दवाओं की तरह कंपनी बदलते ही रेट में 50 से 100 प्रतिशत तक अंतर आ जाता है। इसी प्रकार थोक खरीदी और उपयोग के लिए खरीदी में भी रेट में कई गुना अंतर होता है।

स्वतंत्र जांच करें….

जन स्वास्थ्य अभियान इंडिया के अमूल्य निधि ने बताया, एनपीपीए मार्जिन पर सीमा व कंज्यूमेबल्स की एमआरपी में कमी करें। रेट की स्वतंत्र जांच करनी चाहिए।

दवाओं और कंज्यूमेबल्स के रेट तय करना राज्य के अधिकार में नहीं है। हम शिकायतें नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (एनपीपीए) को भेजते हैं।- मनोज पुष्प, कंट्रोलर, एफडीए, मप्र