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एक वारंट के कारण यह शख्स बन गया था मध्यप्रदेश का चीफ मिनिस्टर, जानिए इनके दिलचस्प किस्से

patrika.com पर प्रस्तुत है पॉलीटिकल किस्सों की सीरिज के तहत पूर्व सीएम बाबूलाल गौर के दिलचस्प किस्से...।

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भोपाल

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Manish Geete

Aug 20, 2021

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मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रहे बाबूलाल गौर की पुण्यतिथि पर विशेष...।

2003 का दौर था, मध्यप्रदेश में दिग्विजय सिंह (digvijay singh) के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार को पछाड़कर भारतीय जनता पार्टी (bjp) भारी बहुमत से सत्ता में आई थी। इसे दिग्विजय शासन के 10 सालों पर सबसे बड़ी जीत माना गया था। मध्यप्रदेश में उमा भारती (uma bharti) की लोकप्रियता चरम पर थी, लिहाजा उन्हें ही मुख्यमंत्री बनाया गया। वे मध्यप्रदेश की पहली महिला मुख्यमंत्री (first cm of madhya pradesh) बनीं। उमा भारती करीब सवा साल तक इस पद पर रही। सबकुछ ठीक-ठाक चल रहा था। तभी एक घटना के बाद उमा भारती को इस्तीफा देना पड़ गया। और, राजनीतिक घटनाक्रम के बाद ऐसे व्यक्ति को मुख्यमंत्री बना दिया गया, जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। वे थे एमपी के बुलडोजर मंत्री बाबूलाल गौर।

 

इसलिए दिया था इस्तीफा

2003 में सीएम बनी उमा भारती को नहीं मालूम था कि जब वे सीएम की कुर्सी संभालेंगी और सालभर बाद ही उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट निकल आएगा। 1994 में कर्नाटक के हुबली शहर में सांप्रदायिक तनाव भड़काने के आरोप में उमा भारती के खिलाफ मुकदमा दायर किया गया था। इसी के चलते यह गिरफ्तारी वारंट जारी हुआ था। इसके बाद उमा को पद छोड़ना पड़ा और ताजपोशी हुई बाबूलाल गौर की। बाबूलाल (babulal gaur) 23 अगस्त 2004 से 29 नवंबर 2005 तक मुख्यमंत्री रहे।

 

 

यूपी के यादव थे बाबूलाल

उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ के नौगीर गांव में 2 जून 1930 को जन्मे बाबूलाल का निधन 21 अगस्त 2019 को भोपाल में हुआ था। अपने भविष्य की चिंता को लेकर बाबूलाल ने उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ से मध्य प्रदेश का रुख किया और फिर यही की मिट्टी में रचे और बसे भी। बताते हैं कि उन्होंने रोजगार के लिए शराब भी बेची और खेती भी की। वे यूपी के यादव थे, उनके पिता एक पहलवान थे। यहां आकर वे गौर बन गए। इसलिए उनकी जाति पर अक्सर सवाल उठते रहे।

 

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एक मिल में मजदूरी भी की

बाबूलाल गौर जब उत्तर प्रदेश से भोपाल आए तो उनके पास रोजगार नहीं था। वे पुराने भोपाल की पुट्टा मिल में मजदूरी करने लगे। मजदूरी के साथ ही वे पढ़ाई भी करते थे। उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की। इसके बाद बीएचईएल में भी उन्हें नौकरी करने गे। वहीं से उन्होंने श्रमिक संगठनों से जुड़ गए और श्रमिक आंदोलन की शुरुआत की। वे भारतीय मजदूर संघ के संस्थापक सदस्य भी रहे। वे राष्ट्रय स्वयं सेवक संघसे जुड़ गए और शाखा में भी जाने लगे थे।

 

पहला चुनाव निर्दलीय लड़ा

1974 के दौर में वे भोपाल से निर्दलीय चुनाव लड़े और जीत गए। यहीं से उनका राजनीतिक करियर शुरू हो गया था। इसके बाद वे लगातार चुनाव जीतते गए। मार्च 1090 से 1092 तक प्रदेश में स्थानीय शासन, विधि एवं विधायी कार्य, संसदीय कार्य, जनसंपर्क, नगरीय कल्याण, शहरी आवास, पुनर्वास एवं भोपाल गैस त्रासदी मंत्री भी रहे। इसके बाद वे गृहमंत्री भी रहे।

 

जब बुलडोजर मंत्री कहलाए

1990 में पटवा सरकार में बाबूलाल को स्थानीय प्रशासन मंत्री बनाया गया। वे दो साल तक इस पद पर रहे। गौर सौंदर्यीकरण और शहर के अतिक्रमण हटाने के लिए हमेशा तैयार रहते थे। यही कारण है कि वे जहा खड़े हो जाते थे, दिशा-निर्देश देकर तत्काल कार्रवाई करवाते थे। राजधानी की वीआईपी रोड पर पहले अतिक्रमण था, उनकी सख्ती के बाद ही यहां मरीन ड्राइव की तरह सड़क बन पाई। ऐसे किस्से भी बताए जाते हैं कि उनके पास नोटों से भरे सूटकेस पहुंचाए जाते थे, लेकिन उनका बुल्डोजर कभी नहीं रुकता था।

 

2016 में हो गए थे किनारे

2016 जून की बात है, पार्टी ने अपने उम्र दराज नेताओं को किनारे करना शुरू कर दिया था। पार्टी ने 70 पार का फार्मूला बनाया, जिसमें ऐसे लोगों को बड़ी जिम्मेदारी से निवृत्त करने का फैसला किया गया। गौर भी इसी फार्मूले की चपेट में आ गए। उनकी उम्र 85 साल हो गई थी और उन्हें पद छोड़ना पड़ा। इसके बाद उनके कई बार पार्टी विरोधी तेवर भी नजर आए और कांग्रेस में जाने की भी अटकलें चलती रही। बाबूलाल गौर अब इस दुनिया में नहीं रहे, लेकिन उनके राजीतिक किस्से आज भी चर्चित हैं।