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MP के दुग्ध संघों में 12 साल से चुनाव ठप, सहकार में अफसरशाही का कब्जा

mp dairy cooperative elections: मध्यप्रदेश के सहकारी दुग्ध संघों में 2012 से चुनाव नहीं हुए। जनता के चुने प्रतिनिधि गायब हैं और अफसरशाही के कब्ज़े से सहकार का असली चेहरा खोता जा रहा है।

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भोपाल

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Akash Dewani

Aug 31, 2025

mp dairy cooperative elections bureaucracy stalled public representation missing election news

mp dairy cooperative elections bureaucracy stalled public representation missing (फोटो- सोशल मीडिया)

mp dairy cooperative elections:सहकारी दुग्ध क्षेत्र के जरिए सरकार प्रदेश को गति देने के सपने देख रही है। भोपाल समेत 6 सहकारी दुग्ध संघों व एमपी स्टेट को-आपरेटिव डेयरी फेडरेशन (MPCDF) को राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (NDDB) के हवाले किया जा चुका है। जन सहयोग से चलने वाले इन सहकारी संस्थानों में पहले अफसरों का दबादबा था, अब दिल्ली के अफसरों की धमक बढ़ रही है। बरसों से चुनाव न होने से 'सहकार' से जनता के प्रतिनिधि गायब हैं। विशेषज्ञों की मानें तो सहकारी दुग्ध क्षेत्र से सहकार खत्म हो रहा है। 'अफसरी' मलाई की परत चढ़ती जा रही है।

ऐसे में दुग्ध सहकारी समितियों के चुने संचालक मंडल जब नहीं होंगे तो जनता के भलाई के फैसले कौन लेगा? अफसरशाही कैसे संतुलित रहेगी। एनडीडीबी-एमपी-सीडीएफ के एमडी का भी कहना है कि नए एग्रीमेंट के अनुसार एमपी-सीडीएफ और दुग्ध संघों में बोर्ड नहीं होंगे। प्रबंधन कमेटियां होंगी। हालांकि इसमें जनप्रतिनिधि रहेंगे, इसलिए दूध विक्रेताओं को चिंता करने की जरूरत नहीं है। (elections news)

एक भी दुग्ध संघ में जनता के प्रतिनिधि नहीं

भोपाल सहकारी दुग्ध संघ में 2012 में चुनाव हुए थे। 2023 के चुनाव परिणाम आने के बाद सहकारी दुग्ध क्षेत्रों की राजनीति करने वालों को चुनाव की उम्मीद थी। लेकिन अब तक नहीं हुआ। अन्य संघों में भी अलग-अलग समय में चुनाव हुए, पर अब किसी में जनता का बोर्ड काम नहीं कर रहा। (elections news)

2008 में चुना था एमपीसीडीएफ अध्यक्ष

विशेषज्ञों की मानें तो 2008 में एमपीसीडीएफ के अध्यक्ष का मनोनयन हुआ था। सरकार ने उसके बाद भी कुछ को मनोनित किया। 2018 में कमलनाथ सरकार ने अध्यक्ष पद पर नियुक्ति की, लेकिन सरकार गिरने के बाद दोबारा किसी को अध्यक्ष नहीं बनाया गया। (elections news)

स्वदेशी को अपनाना हो तो सहकारी दुग्ध क्षेत्र बड़ा जरिया

विशेषज्ञ बलराम बारंगे और मस्तान सिंह का कहना है, स्वदेशी अपनाने के लिए सहकारी दुग्ध सेक्टर बड़ा जरिया है। इस पर निजी कंपनियों का कब्जा है। इसका फायदा जनता-किसान, सरकार को भी नहीं मिल रहा। इस क्षेत्र में चुनाव के जरिए जन सहभागिता से इसे जिंदा करना होगा। (elections news)

जब बोर्ड नहीं, जनप्रतिनिधि भी नहीं तब कैसी 'सहभागिता'

प्रदेश में भोपाल, इंदौर, जबलपुर, ग्वालियर, उज्जैन, सागर को मिलाकर 6 सहकारी दुग्ध संघ हैं। इनके लिए 6 हजार से अधिक प्राथमिक दुग्ध सहकारी समितियां दूध एकत्र करती है। दूध विक्रेता समितियों के सदस्य हैं। यही समिति की कार्यकारिणी चुनते हैं। इसी कार्यकारिणी में से क्षेत्रवार हर सहकारी दुग्ध संघों के लिए संघ प्रतिनिधि भेजे जाते हैं, जो संबंधित दुग्ध संघों के लिए संचालक और ये संचालक अध्यक्ष चुनते हैं। हर दुग्ध संघों में चुना हुआ संचालक मंडल होता है। ये समय-समय पर दुग्ध संघों में जनता की भलाई के निर्णय लेता है।

दूध की बढ़ती दरों, दूध उत्पादन में वृद्धि समेत अन्य मामलों में प्रशासन को सलाह देता है। दुग्ध संघों के संचालक मंडल से एमपीसीडीएफ के लिए प्रतिनिधि भेजे जाते हैं। इसी तरह एमपी-सीडीएफ का संचालक मंडल गठित होता है। इन्हीं में से एक अध्यक्ष चुने जाते हैं। इस तरह एमपीसीडीएफ का संचालक मंडल, सरकार के सामने किसान व जनता के हितों को रखता है और अफसरशाही को एकतरफा निर्णय लेने से रोकता है। हालांकि कुछ दुग्ध उत्पादन समितियों में चुनाव प्रक्रिया चल रही है। (election news)

ये है वर्तमान स्थिति

  • 6 सहकारी दूध संघ गर्मी के सीजन में 10 से 12 लाख लीटर रोज दूध खरीदते हैं।
  • 18 लाख लीटर दूध की बारिश और ठंड में होती है खरीदी।
  • इसे बढ़ाने के लिए एनडीडीबी की मदद ली जा रही है।
  • 9 हजार सहकारी दुग्ध समितियों की संख्या करने की तैयारी का दावा।
  • सहकारी दुग्ध संघों की प्रोसेसिंग व विपणन क्षमता बढ़ाकर उत्पादन का 20 से 50 प्रतिशत दूध खरीदने की तैयारी।