विधानसभा चुनावों के लिए कांग्रेस और बीजेपी के प्रत्याशियों की सूची जारी हो चुकी हैं। इन पार्टी ने जिन नेताओं की टिकट की दावेदारी ठुकराई उन नेताओं के लिए अन्य दल सहारा बन गए हैं। कांग्रेस और बीजेपी के ये नेता सपा-बसपा के सहारे चुनावी नैया पार लगाने दल बदल कर रहे हैं। इधर बसपा ने चुनाव के बाद बननेवाली सरकार में शामिल होने की बात कही है जिससे उनके विधायक न टूटें।
भोपाल. विधानसभा चुनावों के लिए कांग्रेस और बीजेपी के प्रत्याशियों की सूची जारी हो चुकी हैं। इन पार्टी ने जिन नेताओं की टिकट की दावेदारी ठुकराई उन नेताओं के लिए अन्य दल सहारा बन गए हैं। कांग्रेस और बीजेपी के ये नेता सपा-बसपा के सहारे चुनावी नैया पार लगाने दल बदल कर रहे हैं। इधर बसपा ने चुनाव के बाद बननेवाली सरकार में शामिल होने की बात कही है जिससे उनके विधायक न टूटें।
चुनावी मैदान में बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी भी मध्यप्रदेश की राजनीति में तख्तापलट का दावा ठोक रही हैं। दावा है कि उनके बिना सरकार नहीं बन पाएगी।
दोनों पार्टियों के टिकट पर चुनाव लड़ने वालों का इतिहास देखें तो अपने दल से टिकट ना मिलने पर क्षेत्रीय नेता तीसरे दल का दामन तो थाम लेते हैं लेकिन जीत के बाद पार्टी छोड़ सत्ता का साथ देने से भी गुरेज नहीं करते। दोनों ही पार्टियां अब इसका काट तलाश रही हैं।
बसपा प्रदेशाध्यक्ष रमाकांत पिप्पल का कहना है कि अब तक पार्टी सत्ताधारी दल को बाहर से ही सपोर्ट करती थी। इस बार पार्टी सरकार में शामिल होगी। सरकार में शामिल होने से कोई विधायक पार्टी नहीं छोड़ेगा। कोर वोट बैंक के साथ सोशल इंजीनियरिंग पर भरोसा कर रही बसपा को 2 सीटों पर विजय मिली थी। भिंड विधायक संजीव सिंह कुशवाहा ने पार्टी छोड़ दी थी।
संजीव राज्यसभा चुनाव के पहले भाजपा के पाले में आ गए थे। 2013 में भी पार्टी के 4 विधायक जीते थे। पार्टी में सबसे बड़ी जीत 1998 में मिली थी, तब 11 विधायक जीते थे। हालांकि, कांग्रेस 8 विधायकों को अपने पाले में ले आई थी।
सपा ने पिछले चुनाव में एक सीट जीती थी। बिजावर विधायक राजेश शुक्ला भी भाजपा में शामिल हो गए थे। सपा प्रदेश अध्यक्ष रामायण सिंह पटेल का कहना है कि कांग्रेस में इतनी बड़ी तोड़-फोड़ हुई थी, हमारे विधायक भी भाजपा में चले गए। अब ऐसा नहीं होगा।