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MP Election 2023: कच्ची बस्ती पक्के वोट, नेताजी भी पॉश इलाकों की बजाय कच्ची बस्तियों पर निर्भर

मतदान में बढ़-चढ़ कर लेते हैं हिस्सा, फिर भी क्षेत्र में नहीं है कोई विकास...

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शहर के बीचों-बीच नरेला विधानसभा और आधा शहर-आधा ग्रामीण क्षेत्र तक फैली गोविंदपुरा विधानसभा। दोनों क्षेत्रों से शहर की तस्वीर देखी जा सकती है। हर बार की तरह नेताजी इस बार भी अपने प्रचार के लिए यहां के पॉश कवर्ड कैंपस की बजाय बस्ती वाले इलाकों का रुख कर रहे हैं। वजह साफ है कि कवर्ड केंपस की बजाए बस्ती वाले लोग ज्यादा मतदान करते हैं जो नेताजी की जीत हार तय करता है। गोविंदपुरा में आधी आबादी सरकारी कर्मचारियों की है। नरेला का शहरी हिस्सा भी बस्तियों से भरा हुआ है। दोनों ही क्षेत्रों में साल-दर-साल चुनावों के दौरान कई वादे किए जाते रहे, लेकिन यहां के हालात नहीं बदले। नरेला की अन्ना नगर-चंबल बस्ती सबसे बड़ी बस्ती हैं तो गोविंदपुरा की जंबूरी मैदान के पीछे बनी चांदमारी बस्ती में हजारों की आबादी बसती है। इन बस्तियों के रहवासियों ने कई नेताओं को विधानसभा पहुंचाया, लेकिन इनके हालात वही हैं। नाम के लिए पीने के पानी, सीवेज जैसी समस्याएं कहीं-कहीं हल कर दी गईं हैं। फिर भी ऐसा कोई बड़ा बदलाव नहीं आया जिससे इन बस्तियों की तस्वीर बदले। जबकि इनके एक तरफा वोट संबंधित उम्मीदवारों को जिताते आए हैं।

7 हजार लोग सोच-समझकर देंगे वोट

नरेला की सबसे बड़ी बस्ती अन्ना नगर है, जिसमें 7 हजार से अधिक झुग्गियां हैं। इससे लगी हुई सुभाष फाटक बस्ती की तस्वीर भी जुदा नहीं है। देखते ही देखते 35 साल पहले यहां इतनी झुग्गियां बस गईं। यहां के वोट एक ही दल को जाते हैं। अन्ना नगर की आबादी पहले एक दल को वोट देती थी, अब ट्रेंड बदल गया। इन बस्तियों में सबसे अधिक बिहारी-भोजपुरी, मराठी, निमाड़ी लोग रहते हैं।

जो हमारे लिए, हम उसके लिए

गोङ्क्षवदपुरा में 3 हजार से अधिक झुग्गियां हैं, लेकिन सुविधाविहीन। इस बस्ती के वोट उम्मीदवार का भाग्य तय करते हैं, लेकिन जीतने के बाद कोई नहीं आता। यहां चांदमारी में भी 3 हजार झुग्गियां हैं। पेयजल की कोई व्यवस्था नहीं की गई। गंदगी भी बीमार कर रही है। बच्चों के लिए सरकारी स्कूल नहीं हैं। इस क्षेत्र की आबादी डेंगू-मलेरिया से अधिक परेशान हंै।

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