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जेल से बचने के लिए हत्या का आरोपी 9 महीने से आइसीयू में भर्ती

जेल से बचने करते हैं अस्पताल का उपयोग। विशेषज्ञों की राय, जिस बीमारी का उल्लेख है उसमें घर पर भी दी जा सकती हैं दवाएं

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भोपाल. हत्या जैसा संगीन आरोप लेकिन आरोपी जेल की सलाखों की बजाय नो महीने से अस्पताल के आइसीयू में है। कागजों में पैर की नसों में खून का थक्‍का जमने जैसी बीमारी बताई जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस बीमारी में मरीज को इतने लंबे समय तक अस्पताल में रखने की जंरूरत नहीं है। यही नहीं मौजूदा स्थिति में भी मरीज की हालत ऐसी नजरें नहीं आती कि उसे आइसीयू में भर्ती करना पड़े।

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मामला हमीदिया अस्पताल के सर्जीकल वार्ड आठ में भर्ती मरीज का है। यहां एक केदी अक्टूबर 2020 यानी करीब नौ महीने से भर्ती है। भर्ती पर्चे में मरीज को वीनस थम्बोइम्बोलिस लेफ्ट लोअर लिंब यानि नसों में खून का थक्‍का जमना और वैरिको सिटीज (पैर की नसों का फूलना बीमारी का उल्लेख किया गया है। दोनों बीमारियां इतनी
गंभीर नहीं है कि किसी मरीज को इतने लंबे समय तक अस्पताल में रहना पड़े। ऐसे में अब जेल प्रबंधन और अस्पताल प्रबंधन शक के दायरे में आ रहे हैं।

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जेल से बचने करते हैं अस्पताल का उपयोग
अक्सर रसूखदार कैदी को गिरफ्तारी या जेल ही सलाखों से बचने के लिए अस्पताल का उपयोग करते हैं। खुद को बीमार बताकर अस्पताल में एडमिट हो जाते हैं। नियमानुसार बीमार होने पर जेल प्रबंधन कैदी को जेल में फायदा उठाकर यह कैदी लंबे समय तक अस्पताल में पड़े रहते हैं। कई बार बीमारी की गंभीरता के चलते सजा भी कम हो जाती है।

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बताया जा रहा है कि कैदी रसूखदार है। अशोकनगर जिले में कैदी का खासा प्रभाव है। जब पुलिस इसे गिरफ्तार करने पहुंची थी तक उसने पुलिस पर ही कई आरोप लगा दिए थे। भोपाल जेल अधीक्षक दिनेश नरगवे ने बताया कि हम लगातार अस्पताल प्रबंधन से बात कर रहे हैं, लेकिन हर बार वो कैदी के बीमारी होने की बात कह देते हैं। कैदी 302 का आरोपी है, बीमारी के बारे में डॉक्टर ही बता सकते हैं। वही गांधी मेडिकल कॉलेज के डीन, डॉ. जितेन शुक्ला ने कहा कि इस मामले में जानकारी नहीं है, लेकिन ऐसी स्थिति में किसी मरीज को प्रोसीजर के बाद 10 दिन में मेडीकल बोर्ड की मंजूरी के बाद ही भर्ती किया जाता है। इस मामले को दिखवाते हैं।

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