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15 साल की उम्र में हुआ था विवाह, जानिए एक आम गृहिणी कैसे बन गई ‘ठुमरी की रानी’

15 साल की उम्र में हुआ था विवाह, जानिए एक आम गृहिणी कैसे बन गई 'ठुमरी की रानी'

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special story on queen of tumri

15 साल की उम्र में हुआ था विवाह, जानिए एक आम गृहिणी कैसे बन गई 'ठुमरी की रानी'

भोपालः मध्य प्रदेश के राजधानीवासियों को लंबे समय के बाद क्लासिकल, सूफी और बॉलीवुड के तीन कलाकारों का मिलन एक मंच पर देखने को मिलेगा। बॉलीवुड के ये तीनों महान गायक एक साथ एक मंच से द लीजेंड्स कार्यक्रम के ज़रिये 'ठुमरी क्वीन' गिरिजा देवी को म्यूजिकल ट्रिब्यूट देंगे। कार्यक्रम 3 मार्च शाम 6.30 बजे से रवीन्द्र भवन परिसर में होने जा रहा है। कार्यक्रम में बॉलीवुड के मशहूर गायक जावेद अली, राशिद खान और सुनंदा शर्मा प्रस्तुति देंगे। ठुमरी की रानी गिरिजा देवी को म्यूजिकल ट्रिब्यूट देंगे कार्यक्रम में प्रवेश नि:शुल्क होगा। यानि इस शाम का आनंद राजधानी का हर व्यक्ति ले सकता है। कौन थीं ठुमरी की रानी गिरिजा देवी, आइये जानते हैं उनके जीवन के कुछ अनछुए और हसीन सफर के बारे में।

गिरिजा देवी के बारे में खास

‘ठुमरी की रानी’ के नाम से मशहूर गिरिजा देवी संगीत की दुनिया का जाना-माना चेहरा हैं। उनके चाहने वाले उन्हें प्यार से अप्पा जी कहकर बुलाते थे। बनारस की रहने वाली गिरिजा एक प्रसिद्ध भारतीय शास्त्रीय संगीत की जानकार गायिका रहीं। आज भारत में ठुमरी गायन को ख्याति दिलाने में उनका बड़ा योगदान रहा है। ठुमरी गायन को संवारकर उसे लोकप्रिय बनाने में उन्होंने अपना जीवन लगा दिया।

यहां शुरु हुआ महान सफर

8 मई, 1929 को कला और संस्कृति की प्राचीन नगरी वाराणसी (तत्कालीन बनारस) में जन्मीं गिरिजा देवी के पिता रामदेव राय एक ज़मींदार थे। रामदेव भी संगीत के बड़े प्रेमी माने जाते थे। उनके संगीत प्रेम का ही नतीजा था कि, उन्होंने पांच वर्ष की आयु में ही गिरिजा देवी को संगीत की शिक्षा दिलानी शुरु कर दी थी। उनके सबसे पहले संगीत गुरु पंडित सरयू प्रसाद मिश्र थे। नौ वर्ष की आयु में पंडित श्रीचन्द्र मिश्र से उन्होंने संगीत की विभिन्न शैलियों की शिक्षा हासिल की। इस छोटी सी उम्र में ही उन्हें एक हिन्दी फ़िल्म ‘याद रहे’ में अभिनय करने का मौका मिला।

विरोध के बावजूद नहीं मानी हार

एक तरफ जहां गिरिजा के पिता उनके संगीत के गुर सीखने के प्रति फिक्रमंद थे, उनकी मां उतनी ही खिलाफ थीं। उनकी मां और दादी को उनका संगीत सीखने में समय गंवाना पसंद नहीं था। लेकिन फिर भी अपने गुरु की शिक्षा और अपने पिता के समर्थन को महत्व देते हुए उन्होंने संगीत को साधक मानते हुए अपनी मां और दादी की इच्छा के खिलाफ जाकर कड़ा परीश्रम किया। एक साक्षात्कार में गिरिजा देवी बताया था कि, आठ साल की उम्र होते-होते संगीत मेरे रोम रोम में जा पहुंचा था। उन्होंने न केवल ठुमरी, टप्पा, ख्याल आदि का गायन सीखा बल्कि बनारस के आस-पास के क्षेत्रीय गायन चैती, होरी, बारामासा आदि में अच्छी खासी ख्याति प्राप्त की। उन्होंने इन गानों को भी एक अलग रंग और ढंग से पैश किया।

परिस्थितियों से जीतकर हासिल किया मुकाम

15 साल की कच्ची उम्र में गिरिजा की शादी एक बिजनेसमैन मधुसुदन जैन से हुई। वैसे तो मधुसुदन की पहले भी एक बार शादी हो चुकी थी लेकिन फिर भी गिरिजा के पिता ने उन्हें ही उनके लिए चुना, क्योंकि उन्हें पता था कि मधुसुदन कला-प्रेमी है और उन्होंने वादा भी किया कि वे कभी भी गिरिजा के गायन पर प्रतिबंध नहीं लगाएंगे। इस बात का जिक्र करते हुए गिरीजा देवी ने खुद अपने द्वारा दिये एक साक्षात्कार में अपने पति के बारे में बताते हुए कहा था कि, 'शादी के बाद उन्होंने मुझसे कहा कि तुम गाओ, कोई समस्या नहीं है। लेकिन किसी बड़े घर या फिर निजी महफ़िल में गाने की जरूरत नहीं है। उसके बजाए किसी बड़ी कांफ्रेंस, कॉन्सर्ट या रेडियो पर गाने को महत्व देना। उन्होंने कहा कि, उस समय तक मेरे पहले गुरु भी दुनिया से विदा हो चुके थे, इसलिए मेरे पति ने एक दुसरे गुरु श्रीचंद मिश्रा से मुझे शिक्षा दिलवाई।

वो ऐसे बनी एक आम गृहणी से 'ठुमरी की रानी'

उनके जीवन का बड़ा हिस्सा संघर्ष करने में ही गुज़र गया, लेकिन इस संघर्ष ने ही उन्हें जीवन में सफल किया। मां और दादी के अलावा उस दौर में समाज ने भी गिरिजा देवी का बड़ा विरोध किया। फिर शादी के बाद पति और बच्चों की ज़िम्मेदारी। पर कहते हैं न कि इंसान की किस्मत पहले से ही तय होती है। इसलिए चाहे कोई कितना भी जोर लगा ले पर इंसान खुद दृण शक्ति के साथ आगे बढ़े तो मुश्किलें लाख क्यों ना सामने आन खड़ी हों, मंजिल मिल ही जाती है। इसी की मिसाल पैश की गिरिजा देवी ने, अपने पिता के सपने को संकल्प मानकर चलती रहीं और अंत में 'ठुमरी क्वीन' का खिताब पाया।

इत्तेफाख से ख्याति तक का सफर

वैसे तो उन्होंने साल 1949 से रेडियो पर गायन शुरु कर दिया था, लेकिन तब तक उन्होंने पब्लिक के सामने कोई प्रस्तुति नहीं दी थी। साल 1951 में वे बिहार में आरा में एक कांफ्रेंस में शामिल होने गईं थीं। यहां उस सयम के ख्याति प्राप्त गायक पंडित ओंकारनाथ जी का गायन होना था, लेकिन कार्यक्रम में पहुंचने के दौरान रास्ते में उनकी गाड़ी खराब हो गई, जिस कारण वे समय पर पहुंचने में असमर्थ थे। ऐसे में आयोजकों के सामने कार्यक्रम को व्यवस्थित रूप से संचालित करना एक बड़ी चुनौती बन गया था। इस दौरान आयोजनकर्ताओं में ही किसी ने गिरिजा देवी को उनके स्थान पर गाने की अपील की। इस आयोजन से ही उन्हें काफी ख्याति मिलनी शुरु हुई और यहीं से उनका पब्लिक के सामने गायन करने का सफर भी शुरु हो गया।

'अप्पा जी' बुलाये जाने की कहानी भी मजेदार है

लोगों द्वारा उन्हें ‘अप्पा जी’ बुलाे जाने के पीछे भी एक मजेदार कहानी जुड़ी है। दरअसल, उन्हें अपनी बहन के बेटे से बहुत लगाव था और उनकी बहन के बेटे ने जब बोलना शुरू किया तो सबसे पहले उन्हें ही अप्पा कहकर बुलाया। इसके बाद उनके घर-परिवार में भी सबने उन्हें अप्पा के नाम से संबोधित करना शुरु कर दिया और इस तरह से वे बन गईं 'अप्पा जी'।

गिरिजा देवी से जुड़ी कुछ खास बातें

गिरिजा ने रेडियो के लिए भी बहुत कार्यक्रम किये। लोग अगर उन्हें सुनते तो सुनते ही रह जाते थे। उनके सुर लोगों का मन मोह लेते थे। उनके जीवन और संगीत के उपर डॉक्युमेंट्री भी बनी- गिरिजा: अ लाइफटाइम इन म्यूजिक! इसे उनके ही छात्रों ने बनाया। अपने जीवन का अंतिम समय उन्होंने कोलकाता के संगीत रिसर्च अकादमी में बिताया। संगीत के लिए किये योगदान के कारण उन्हें कई सम्मान और पुरस्कार मिले। उन्हें भारत सरकार ने तीनों विशिष्ट सम्मानों से सम्मानित किया। साल 1972 में पद्मश्री, साल 1989 में पद्मभूषण तो साल 2016 में उन्हें पद्मविभूषण की उपाधि मिली। इसके अलावा उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और महान संगीत सम्मान अवार्ड से भी नवाज़ा गया। 24 अक्टूबर, 2017 को कोलकाता में दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया। उनके चाहने वालों का कहना है कि, आज वो तो इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन वो अपने पीछे संगीत की एक अमूल्य विरासत छोड़ गई हैं। जिसे संगीत प्रेमियों की हर पीढ़ी के लिए आशीर्वाद माना जाएगा।