
लोकसभा चुनाव 2019
भोपाल. मुख्यमंत्री कमलनाथ ने भाजपा को सलाह दी है कि उसे लोकसभा चुनाव के प्रत्याशी तय करने के लिए विज्ञापन निकालना चाहिए, लेकिन कांग्रेस में भी स्थिति बहुत साफ नहीं है। भाजपा अब तक 18 प्रत्याशी घोषित कर चुकी है। मध्यप्रदेश में कांग्रेस महज नौ प्रत्याशियों के नाम का ऐलान कर पाई है। भाजपा के लिए 11 और कांग्रेस के लिए 20 सीटों पर पेंच फंसा हुआ है। दोनों दल फंूक-फंूककर कदम उठा रहे हैं। दोनों दल अपने-अपने गढ़ों में भी प्रत्याशी तय नहीं कर पाए हैं। कांग्रेस स्क्रीनिंग कमेटी की कई दौर की बैठकें जो चुकी हैं। भाजपा में भी सीईसी की बैठकें हो चुकी हैं।
- गढ़ में भी तय नहीं नाम
भोपाल : ये सीट भाजपा का गढ़ मानी जाती है। यहां कांग्रेस 30 सालों से जीत को तरस रही है। कांग्रेस ने पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को चुनाव मैदान में उतारकर बड़ा दांव खेला है। इसके बाद शुरू हुए भाजपा के मंथन में कभी शिवराज सिंह चौहान तो कभी उमा भारती का नाम निकला, लेकिन तय नहीं हो पाया। अब नरेंद्र सिंह तोमर के नाम की भी चर्चा होने लगी है। भाजपा यहां से छोटे नेता को उतारकर जोखिम नहीं लेना चाहती।
जबलपुर : कांग्रेस में जबलपुर प्रत्याशी के लिए नाम का टोटा है। कांग्रेस यहां 15 साल से जीत को तरस रही है। भाजपा अपने प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह को प्रत्याशी घोषित कर चुकी है। कांग्रेस को राज्यसभा सदस्य विवेक तन्खा ही खेवनहार के रूप में नजर आ रहे हैं, लेकिन मंथन अभी भी पूरा नहीं हुआ।
इंदौर : ये भाजपा का सबसे बड़ा गढ़ और कांग्रेस के लिए सबसे कठिन सीट मानी जा सकती है। यहां से नौ बार की सांसद सुमित्रा महाजन पर भी पेंच फंस गया है। ये सीट एक बार फिर ताई-भाई के पेंच में फंसी है। महाजन यहां से फिर टिकट चाहती हैं तो भाजपा 75 पार के फॉर्मूले पर काम करना चाहती है। कांग्रेस को यहां जिताऊ उम्मीदवार नहीं मिल रहा है।
गुना : ये सिंधिया परिवार की परंपरागत सीट है। ज्योतिरादित्य सिंधिया यहां से चार बार से सांसद हैं। भाजपा के इंदौर की तरह कांग्रेस की गुना सीट पर भी पेंच फंसा है। विधानसभा चुनाव में गुना और शिवपुरी की हार ने सिंधिया के माथे पर सलवटें ला दी हैं। सिंधिया ग्वालियर से चुनाव लडऩे का मन बना रहे हैं तो संगठन उनको गुना से ही चुनाव लड़वाना चाहता है, इसलिए नतीजा नहीं निकल पा रहा है। यहां से भाजपा सिंधिया की टक्कर का प्रत्याशी नहीं तलाश पा रही है। जयभान सिंह पवैया भी विधानसभा चुनाव हार चुके हैं।
छिंदवाड़ा : कांग्रेस का अभेद्य गढ़ होने के बाद भी वो प्रत्याशी तय नहीं कर पाई है। कमलनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद उनके पुत्र नकुलनाथ का चुनाव लडऩा लगभग तय है, लेकिन देरी का कारण कयासों को जन्म दे रहा है। हालांकि, कमलनाथ कार्यकर्ताओं के बीच इस बात के संकेत दे चुके हैं। भाजपा के लिए छिंदवाड़ा हमेशा सबसे कठिन सीट रही है, भाजपा यहां पर भी दमदार प्रत्याशी उतारने का मन बना रही है।
सीधी : भाजपा ने यहां से सांसद रीति पाठक को फिर से मौका दिया है। खराब रिपोर्ट कार्ड के बाद भी भाजपा के पास रीति का विकल्प नहीं था। इस सीट पर कांग्रेस की ओर से अजय सिंह का नाम लगभग तय है, लेकिन घोषित नहीं हुआ। सीधी की टेढ़ी राजनीति से पार पाना कांग्रेस के लिए आसान नहीं दिखता है। ये माना जा सकता है कि विंध्य के मामले में अभी सबकुछ ठीक नहीं है।
रतलाम : कांग्रेस के इस गढ़ में भाजपा को संकट है। भाजपा के पास कांग्रेस के कांतिलाल भूरिया के मुकाबले कोई उम्मीदवार नहीं है। कांग्रेस ने कांतिलाल भूरिया का नाम घोषित कर दिया है, लेकिन भाजपा में अभी तलाश जारी है। कांग्रेस से आयातित दिलीप सिंह भूरिया ने भले ही 2014 में कांतिलाल से सीट छीन ली, लेकिन उनके निधन के बाद उपचुनाव में फिर से ये सीट कांतिलाल के खाते में चली गई। दिलीप की बेटी निर्मला हार गईं। निर्मला विधानसभा चुनाव भी हार चुकी हैं। लिहाजा पार्टी को विकल्प की तलाश है।
तीन-चार दिन में कांग्रेस के ज्यादातर उम्मीदवार तय हो जाएंगे। पार्टी को कहीं कोई मुश्किल नहीं है। रणनीति के हिसाब से काम किया जा रहा है।
- कमलनाथ, मुख्यमंत्री
भाजपा पूरी 29 सीटें जीतने के लिए चुनाव लड़ रही है। टिकट तय करना चुनाव समिति का अधिकार है।
- शिवराज सिंह चौहान, पूर्व मुख्यमंत्री
Updated on:
31 Mar 2019 10:38 pm
Published on:
01 Apr 2019 05:07 am
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