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MP Politics: बदलते मिजाज का यह फॉर्मूला, भाजपा के सामने खड़ी कर देगा नई मुश्किलें!

लाखों कर्मचारी सरकार के विरोध की तैयारी में व्हॉट्सएप, फेसबुक सहित सोशल मीडिया पर हो रहे एकजुट...

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भोपाल। इस बार का चुनाव दोनों ही पार्टियों के लिए बड़ा पैंचेदगी भरा हो सकता है। जानकारों के अनुसार जहां एक ओर कांग्रेस में एकजुटता नहीं है,वहीं कर्मचारियों की नाराजगी भाजपा को इस बार भारी पड़ सकती है।

दरअसल सामने आ रहीं खबरों के अनुसार इन दिनों लाखों कर्मचारी बिना किसी कर्मचारी संगठन, मोर्चा या संघ के बैनर के सरकार की खिलाफत में जुटे हैं। इसके साथ ही वे आंतरिक विरोध की तैयारी भी कर रहे हैं। दरअसल, भले ही शासन ने सातवें वेतनमान का लाभ कर्मचारियों को दे दिया हो, लेकिन अभी भी प्रदेश के 70 फीसदी से ज्यादा (करीब 15 लाख) सरकारी कर्मचारी इस लाभ से वंचित है।

वहीं राजनीति के जानकारों का यह भी मानना है कि कर्मचारियों के बदलते मिजाज का यह फॉर्मूला, भाजपा के सामने खड़ी नई मुश्किलें कर देगा, जबकि कांग्रेस भी इसी मौके की तलाश करती दिख रही हैं, ऐसे में भाजपा के सामने मुश्किलें बढ़ना तय माना जा रहा है। वहीं जानकारों का यह भी कहना है इसका सबसे सही उपाय यहीं है कि सरकार जल्द से जल्द इन परेशानियों का निराकण कर दे।

इन नाराज कर्मचारियों ने कर्मचारी संगठनों से दूरी बनाकर विरोध के लिए व्हॉट्सएप, फेसबुक को अपना हथियार बना लिया है। वे सोशल मीडिया पर ग्रुप बनाकर भाजपा को वोट न देने की अपील कर रहे हैं।

चाहे सातवें वेतनमान(7th pay commission) का मामला हो या कर्मचारियों से जुड़े अन्य मुद्दों का। अधिकतर कर्मचारी संगठन, संस्था, मोर्चा आदि ऐसे मामलों में आंदोलनों से दूर ही रहना पसंद करते हैं। इस कारण कर्मचारी आंदोलन, ज्ञापन कार्यक्रमों और बैठकों में अनुपातिक रूप से करीब 10 से 12 प्रतिशत ही अपनी मौजूदगी दर्ज कराते हैं। लेकिन, इस बार सातवें वेतनमान के मुद्दे पर तमाम कर्मचारियों में रोष दिख रहा है।

ये कर्मचारी हैं सातवें वेतनमान से वंचित:

क्रमांक - विभाग - पद कर्मचारियों की संख्या

1 - नगर पालिका, निगम और निगम मंडल - 1 लाख 54 हजार

2 - ग्रामीण निकायों - 1 लाख 60 हजार

3 - पेंशनर्स (जो जीवित हैं) - 3 लाख 29 हजार

4 - पेंशनर्स की विधवाएं (जिन्हें पारिवारिक पेंशन मिलती है) - 1 लाख 52 हजार

5 - पंचायत सचिव - 23 हजार

6 - ग्रामीण सहकारी समितियों के कर्मचारी - 35 हजार

7 - अध्यापक संवर्ग - 2 लाख 50 हजार

8 - संविदा कर्मचारी - 2 लाख

9 - विश्वविद्यालय कर्मचारी - 8 हजार

संगठनों से दूरी के ये हैं कारण
कुछ कर्मचारियों ने नाम न छापने की शर्त पर जानकारी देते हुए बताया है कि ज्यादातर कर्मचारी शासन-प्रशासन और राजनीतिक दलों का सीधा विरोध नहीं करना चाहते। वहीं संगठन में जुड़ने से उनका नाम भी सार्वजनिक हो जाता है। साथ ही कार्रवाई, ट्रांसफर, सीआर खराब होने का डर भी बना रहता है। वहीं कुछ कर्मचारी आंदोलनों में विश्वास नहीं रखते और केवल आंतरिक विरोध ही करते हैं।

वहीं कुछ कर्मचारियों तो यह तक मानते हैं कि संगठनों द्वारा सिर्फ अपनी राजनीति चमकाने का काम किया जाता है। वहीं मांगों को लेकर सिर्फ नाम मात्र का आंदोलन होता है। इसी के चलते सतपुड़ा, वल्लभ भवन में होने वाली हड़तालों को कभी पूरा समर्थन नहीं मिला।

ये है विरोध की प्लानिंग
जानकारों का मानना है कि सीधे तौर पर कहा जाए तो कर्मचारी बीजेपी सरकार से खफा हैं। इस कारण गुुपचुप तरीके से आगामी चुनाव में बीजेपी को वोट न देने की मुहिम भी चला रहे हैं। इसमें केवल कर्मचारी ही नहीं बल्कि उसके पूरे परिवार, रिश्तेदार और मित्रों को भी वोट नहीं देने की बातचीत भी की जा रही हैं। व्हॉट्सएप ग्रुपों और सोशल मीडिया पर ग्रुप बनाकर कर्मचारी विरोधी नीतियों से अन्य कर्मचारियों को भी अवगत करा रहे हैं।

वहीं इस पूरे मामले को लेकर भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता राहुल कोठारी का कहना है कि कर्मचारियों को बीजेपी की खिलाफ रणनीति बनाने के स्थान पर अपने काम पर जोर देना चाहिए। हमारी सरकार कर्मचारी हितैषी है। बचे हुए कर्मचारियों को भी जल्द सातवें वेतन मान का लाभ दिया जाएगा। जल्द ही इस नाराजगी को दूर करने का प्रयास भी किया जाएगा।