
Raja Naresh Chandra Singh- मध्यप्रदेश के आदिवासी सीएम राजा नरेंद्रचंद्र सिंह। (फोटो - विकिपीडिया)
Raja Naresh Chandra Singh- राजनीति में कई नेता ऐसे होते हैं, जिनकी कहानियां प्रेरणा देती है, इसके बावजूद उनके किस्से इतिहास के पन्नों में कहीं गुम हो जाते हैं। ऐसा ही एक किस्सा मध्यप्रदेश के पहले आदिवासी मुख्यमंत्री का है, जिनका राजनीति में कद तो काफी बड़ा था, लेकिन मुख्यमंत्री के रूप में कार्यकाल महज 13 दिनों का था। नाम है सारंगढ़ के राजा नरेशचंद्र सिंह।
बात उस समय की है जब मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी और सीएम द्वारिका प्रसाद मिश्र थे। कांग्रेस के खिलाफ कई दल खड़े होने लगे थे। संयुक्त विधायक दल (संविद) बन चुका था। उस समय चौथे आम चुनावों में इस दल को भारी सफलता मिली। राजमाता विजयाराजे सिंधिया (Rajmata Vijayaraje Scindia) इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) से नाराज हो गई थी। उन्होंने कई विधायकों साथ ले लिया था। उस समय विधानसभा चुनाव हुए तो राजमाता गुना से भारी मतों से निर्दलीय चुना जीत गई। तब तक कांग्रेस में भी दरार पड़ गई थी। गोविंद नारायण सिंह के नेतृत्व में 35 विधायक राजमाता के साथ आ गए। राजमाता ने भी तुरंत कांग्रेस विधायकों को अपने साथ ले लिया और संविद सरकार बनाई थी। यह पहली गैर कांग्रेसी सरकार थी।
जनसंघ, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी और कांग्रेस से टूटकर आए विधायक ने राजमाता को मुख्यमंत्री बनाने का प्रस्ताव दिया, लेकिन उन्होंने कांग्रेस के ही बागी नेता गोविंद नारायण सिंह को मुख्यमंत्री बनवा दिया। हालांकि वे संविद सरकार महज 19 माह ही चला पाएं और मतभेदों के चलते 12 मार्च 1969 को पद छोड़ दिया। इसके बाद राजमाता ने 13 मार्च को नरेशचंद्र सिंह को मुख्यमंत्री पद के लिए उचित समझा। लेकिन, शपथ लेने के 13वें दिन 25 मार्च को राजा नरेश चंद्र ने भी इस्तीफा दे दिया। क्योंकि वे भी सरकार नहीं चला पा रहे थे। पहली बार किसी आदिवासी को मध्य प्रांत का मुख्यमंत्री बनाया गया था।
पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह (Arjun Singh) अपनी आत्मकथा में लिखते हैं कि मार्च 1969 की रात मेरे निवास पर गोविंद नारायण आए तो उन्हें देखकर मैं चौंक गया था। वे रात को आए थे। वे सरकार से तंग आ चुके थे और इस्तीफा देकर कांग्रेस में वापस आना चाहते थे। अगले दिन सुबह 7 बजे उन्होंने मेरे पास एक बंद लिफाफे में एक पत्र दिया जो कांग्रेस अध्यक्ष एस निजलिंगप्पा के नाम था। उस पत्र को लेकर मैं बेंगलुरू गया और कुछ सप्ताह बाद कांग्रेस ने गोविंद नारायण को वापस ले लिया। गोविंद कांग्रेस में फिर से विधायक दल के नेता बन गए थे।
अर्जुन सिंह ने अपनी किताब 'ए ग्रेन ऑफ सैंड इन दि आवरग्लास ऑफ टाइम' में कई राजनीतिक अनुभव साझा किए थे। इस किस्से में राजा नरेशचंद्र सिंह के शपथ ग्रहण के लिए राजभवन जाने का किस्सा भी चर्चित रहा है। जब नरेशचंद्र सिंह को शपथ लेने के लिए राजभवन बुलाया गया था, तो वे सरकारी आलीशान गाड़ियों के बजाय साधारण टैक्सी में राजभवन पहुंचे थे। एकमात्र आदिवासी मुख्यमंत्री की यह सादगी आज भी याद की जाती है।
राजनीतिक उठापटक से आहत होकर राजा नरेशचंद्र ने राजनीति से ही संन्यास लेने का फैसला कर लिया। वे बाकी जिंदगी समाजसेवा में गुजारने लगे। वे राजनीति से जुड़े बयानबाजी से भी दूर रहने लगे थे।
नरेशचंद्र संन्यास के 11 साल बाद 1980 में इंदिरा गांधी का फोन नरेशचंद्र के पास आया तो वे धर्म संकट में पड़ गए थे, क्योंकि इंदिरा रायगढ़ से उन्हें लोकसभा चुनाव लड़ाना चाहती थी। नरेंद्रचंद्र ने चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया, लेकिन इंदिरा का मान रखते हुए अपनी बेटी पुष्पा को चुनाव लड़वाया।
नरेशचंद्र के संन्यास लेने के बाद उनके परिवार के सदस्य भी राजनीति में आए। नरेशचंद्र के इस्तीफे के बाद 1969 में पुसौर विधानसभा सीट से उनकी पत्नी ललिता देवी निर्विरोध चुनाव जीतीं। इसके बाद उनकी चार में से तीन बेटियां और एक बेटा राजनीति में सक्रिय रहे। उनकी बेटी कमला देवी विधायक बनी और मंत्री भी रहीं। बेटी रजनीगंधा और पुष्पा भी लोकसभा सांसद बनी। पुत्र शिशु बिन्दू सिंह विधायक बने। 11 सितंबर 1987 को राजा नरेश चंद्र सिंह ने अंतिम सांस ली थी।
Updated on:
10 Sep 2026, 6:50 PM IST
Published on:
10 Sep 2026, 6:10 PM IST
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