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राम पथ गमनः श्रीराम ने यहाँ पर गुज़ारे साढ़े 11 साल, जानिए कहाँ और कैसे रहे वनवास में राम

रामलला के भव्य मंदिर में विराजित होने के बाद जहां देशभर में जश्न का माहौल है वहीं श्रीराम से संबंधित स्थानों, मंदिरों, स्मारकों आदि को संरक्षित करने या संवारने के काम में भी नया उत्साह जाग उठा है। इस ऐतिहासिक मौके पर हम आपको श्रीराम के जीवन से जुड़े अनेक पहलुओं से अवगत करा रहे हैं। पत्रिका डाट काम पर प्रस्तुत है मेरे राम सीरीज जिसमें आज हम श्रीराम के वन गमन पथ के बारे में बता रहे हैं ।

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श्रीराम के वन गमन पथ

रामलला के भव्य मंदिर में विराजित होने के बाद जहां देशभर में जश्न का माहौल है वहीं श्रीराम से संबंधित स्थानों, मंदिरों, स्मारकों आदि को संरक्षित करने या संवारने के काम में भी नया उत्साह जाग उठा है। इस ऐतिहासिक मौके पर हम आपको श्रीराम के जीवन से जुड़े अनेक पहलुओं से अवगत करा रहे हैं। पत्रिका डाट काम पर प्रस्तुत है मेरे राम सीरीज जिसमें आज हम श्रीराम के वन गमन पथ के बारे में बता रहे हैं ।

वनवास के दौरान श्रीराम ने सबसे ज्यादा समय चित्रकूट में बिताया था। यहां से ही वे पन्ना पहुंचे और इसके बाद सारंग पहाड़ी से होते हुए नासिक की ओर चले गए थे। राम वन गमन के इस पथ को अब सरकार संवारने का काम कर रही है।

श्रीराम की वन गमन यात्रा अयोध्या से शुरू हुई थी। प्रतापगढ़, प्रयागराज, कौशांबी आदि से होते हुए श्रीराम चित्रकूट पहुंचे। एमपी में वे चित्रकूट से अमरकंटक तक करीब 1450 किमी चले जिस पर अब राम वन गमन पथ परियोजना को आकार देने की भी बात कही जा रही है। हम आपको श्रीराम के इस वन गमन यात्रा के अहम पड़ावों से अवगत करा रहे हैं-

चित्रकूट में श्रीराम के साढ़े 11 साल
कामदगिरि
प्रभु श्रीराम ने वनवास के साढ़े 11 वर्ष इसी पर्वत पर गुजारे थे। मंदाकिनी नदी के घाट के ठीक ऊपर पर्णकुटी है। पुजारी बच्चू महाराज बताते हैं कि मंदिर 773 वर्ष पुराना है। यज्ञ वेदी दिखाते हुए उन्होेंने बताया कि प्रभु श्रीराम के पहुंचने से पहले ब्रह्माजी ने यज्ञ किया था। इससे लगे वन क्षेत्र में ऋषि मुनियों के आश्रम में श्रीराम जाते थे।

राम घाट
अर्चन द्विवेदी बताते हैं कि प्रभु श्रीराम ने रामघाट पर ही अपने पिता दशरथ का पिण्डदान किया था। लिहाजा हिन्दू धर्म की मान्यता के अनुसार पूर्वजों का पिण्डदान यहां किया जाता है। मप्र सरकार ने इस घाट का विस्तार करते हुए भरत घाट का निर्माण कराया है। श्रद्धालु इस घाट पर डुबकी जरूर लगाते हैं और दीपावली के दिन विहंगम दीपदान मेले का आयोजन होता है।

स्फटिक शिला
पुजारी जुगुल किशोर द्विवेदी के अनुसार मंदाकिनी के किनारे शिला पर एक बार सीता बैठी थीं तभी इंद्र का पुत्र जयंत कौवा के रूप में पहुंचा। तंग करने के लिए उसने सीता के पैर में चोंच मार दी। यह देख प्रभु क्रोधित हो गए। शिला पर मौजूद तिनकों से धनुष बाण बनाया और प्रहार कर दिया।

गुप्त गोदावरी
दो बड़ी गुफाएं हैं। एक में बारह महीने निर्मल जल प्रवाहित होता रहता है। यहां के महंत बालक दास बताते हैं कि रामायण के अनुसार माता सीता यहां स्नान करने आती थीं। नासिक में बहने वाली गोदावरी नदी भगवान राम के दर्शन के लिए यहां प्रकट हुई थी एवं पुनः विलुप्त हो गई। दूसरी गुफा में मयंक नाम का राक्षस था जिसका वध लक्ष्मण ने किया था।

अत्रि आश्रम
यह स्थान सती अनुसुइया के नाम से प्रसिद्ध है। श्रीराम सीता की अत्रि मुनि तथा मां अनुसुइया की भेंट हुई थी। माता अनुसुइया ने राम सीता को दाम्पत्य जीवन के साथ सामाजिक जीवन निर्वहन करने का दायित्व समझाया था। माता अनुसुइया ने ब्रह्मा, विष्णु और महेश को बालक रूप बना दिया था। मान्यता है कि अनुसुइया की तपस्या के फलस्वरूप मां गंगा यहां मंदाकिनी के रूप में धाराओं के रूप में प्रकट हुई थीं।

सरभंग आश्रम
मझगवां से 20 किमी दूर जंगल के बीच में यह आश्रम है। आश्रम के महंत रामशिरोमणि दास बताते हैं कि यहीं पर वनवासी राम का आतिथ्य करने के बाद सरभंग मुनि ने खुद को योगाग्नि में भस्म कर लिया था। यहां प्रभु ने अपने बाण से गर्म जल का स्रोत पैदा किया था, जो आज भी मौजूद है। यहां आज भी त्रेता युगीन 108 यज्ञ वेदियां मौजूद हैं, जिन्हें पुरातत्व विभाग ने संरक्षित क्षेत्र घोषित किया है। मान्यता है कि यदि कोई 10 बार गंगा स्नान करता है और यदि एक बार सरभंग आश्रम आता है तो भी उसे उतना ही पुण्य मिलता है।

सिद्धा पहाड़- राम प्रतिज्ञा स्थल
सरभंग मुनि ने भगवान श्रीराम को आश्रम से कुछ दूरी पर दिख रहे पहाड़ के बारे में बताया कि यह ऋषि मुनियों की अस्थियों का ढेर है जो राक्षसों ने उन्हें मारकर खाने के बाद फेंक दिया है। इसके बाद क्रोधित होकर प्रभु राम इस स्थल पर पहुंचते हैं। रामायण के अनुसार वे यहां धनुष रखने के बाद भुजा उठाकर धरती से समस्त राक्षसों के संहार का संकल्प लेते हैं। राम प्रतिज्ञा के इस स्थल को आज सिद्धा पहाड़ के नाम से जाना जाता है।

टाठी घाट
स्थानीय जनों की मान्यता है कि इस स्थान पर श्रीराम के लिए भोजन से सजी थाली नदी से आती थी। उनके ग्रहण करने के बाद लौट जाती थी। स्थानीय बोली में थाली को टाठी कहा जाता है। यह स्थान जंगलों के बीच मंदाकिनी चित्रकूट के तट पर है।

सुतीक्ष्ण आश्रम
सतना में सिद्धा पहाड़ से लगभग दो किलोमीटर दूर स्थित है सुतीक्ष्ण आश्रम। आश्रम के महंत रामेश्वर दास यहां के महत्त्व के बारे में बताते हैं कि आश्रम में महर्षि अगस्त्य के शिष्य सुतीक्ष्ण मुनि रहा करते थे। प्रभु श्रीराम वनवास काल में यहां पहुंचे थे। यहां प्रभु काफी समय तक रहे और मुनि जी से विधिवत अस्त्रशस्त्र की दीक्षा भी ली।

अश्वमुखी मंदिर
सरभंग आश्रम से एक किमी दूर अश्वमुखी देवी मंदिर है। महंत रामशिरोमणि दास बताते हैं कि संभार नामक पर्वत की गुफा में शुंभासुर राक्षस रहता था। वह मुनियों की तपस्या में विघ्न पैदा कर उन्हें मार डालता था। इससे द्रवित होकर देवी ने उस राक्षस के साथ गुफा में भीषण युद्ध किया और उसे चीरती हुईं निकलीं। माता अश्वमुखी पाषाण प्रतिमा के रूप में परिवर्तित हो गईं। यह सुरंग अश्वमुखी मंदिर परिसर में विद्यमान है।

सीता रसोई और रामशैल
इन दोनों स्थलों का रामायण में वर्णन तो नहीं, लेकिन लोक मान्यता है कि सीता रसोई वह स्थल है जहां राम, सीता और लक्ष्मण ने रात्रि विश्राम किया था। यहां मंदिर बना है। यह स्थल कोठी से 20 किमी दूर रक्सेलवा गांव में है। सीता रसोई में वनवासी पूजा करते हैं। मनौती मांगने आते हैं। सीता रसोई से 4 किमी दूर पर्वत है जिसे लेड़हरा पहाड़ के नाम से जाना जाता है। पहले इसे रामशैल पर्वत के नाम से जाना जाता था।

ये भी प्रमुख स्थान
बांधवगढ़
किंवदंती है कि श्रीराम ने बांधवगढ़ में एक चौमासा व्यतीत किया। भगवान राम ने यह स्थान लक्ष्मण को सौंपा था। बांधव का अर्थ भाई व गढ़ का अर्थ किला। इस तरह यह बांधवगढ़ कहलाया।

दशरथ घाट
बांधवगढ़ के बाद श्रीराम ने सोन और जोहिला नदी के संगम में पिता दशरथ का तर्पण किया था। दशरथ घाट उमरिया बिजौरी के समीप है। भगवान कार्तिकेय का मंदिर भी यहां है।

सीतामढ़ी गंधिया
शहडोल जिले में जयसिंहनगर के गंधिया के नजदीक है सीतामढ़ी। यहां श्रीराम, सीता और लक्ष्मण के साथ पहुंचे थे। माता सीता और श्रीराम रात में ठहरे थे। भोजन किया था। यहां एक रसोई भी बनी हुई थी।

सीतामढ़ी कनवाई
अनूपपुर जिले में कोतमा के खोडऱी में स्थित है सीतामढ़ी कनवाई। पुजारी नरेंद्र तिवारी ने बताया कि राम वन गमन स्थलों की सूची में सीतामढ़ी 73वें नंबर पर है। यहां प्रभु के चरण कमल के निशान हैं।

भरभरा आश्रम
कटनी जिले के उमरियापान क्षेत्र में भरभरा आश्रम सिलपरा नदी के किनारे है। संत बनवारी दास महाराज ने बताया कि यहां प्रभु राम की चरण पादुका स्थापित हैं।

रामघाट पिपरिया
प्रभु ने दंडकारण्य वन छत्तीसगढ़ जाने के लिए रामघाट पिपरिया ;जबलपुर में नर्मदा पार की थी। यह स्थान शहपुरा के पास स्थित है। यहां मंदिर का निर्माण लगभग दो दशक पहले हुआ था।

पासी घाट
नर्मदापुरम जिले में नर्मदा किनारे उमरधा के निकट पासी घाट में श्रीराम ने एक रात्रि विश्राम व स्नान किया था।

माच्छा
यहां नर्मदा किनारे श्रीराम ने शिवजी की पूजा की थी।

बृहस्पति कुण्ड- यहां देवगुरु बृहस्पति ने किया था यज्ञ
पन्ना जिला मुख्यालय से करीब 35 किमी दूर पहाड़ीखेरा के निकट है बृहस्पति कुण्ड। एक कथा के अनुसार देवगुरु बृहस्पति ने यहां यज्ञ किया था। ऋषि मुनियों के आश्रम भी यहां थे। भगवान राम वनवास काल में ऋषि मुनियों के दर्शन करने के लिए आए थे।

मार्कण्डेय आश्रम
चित्रकूट क्षेत्र से जब प्रभु श्रीराम आगे बढ़ते हुए सोन नदी के तट पर पहुंचे तो वहां मार्कण्डेय ऋषि के आश्रम में कुछ समय गुजारा था। यह आश्रम बाणसागर जलाशय के डूब क्षेत्र में आ गया है। पुनर्निर्माण जलाशय के किनारे मार्कण्डेय घाट के ऊपर किया गया है। यहां से जलाशय का विहंगम दृश्य नजर आता है। मान्यता है कि यहां से श्रीराम ने बांधवगढ़ प्रस्थान किया था।

1450 किमी लंबा होगा प्रभु के वन गमन का रूट
राम वन गमन पथ की परियोजना के अनुसार प्रभु राम के वन गमन का रूट कुल 1450 किमी लंबा होगा। पहला रूट 168 किलोमीटर लंबा होगा। नौ स्थल सतना में सीता रसोई, अत्रि.अनुसुइया आश्रम, स्फटिक शिला, गुप्त गोदावरी, सरभंग आश्रम, अश्वमुखी मंदिर, सुतीक्षण आश्रम, सिद्धा पहाड़ और रामशैल हैं। इसके साथ ही दसवां स्थान पन्ना जिले में स्थित बृहस्पति कुण्ड है।

दूसरा रूट- यह 428 किमी का है। इसमें पन्ना जिले के बृहस्पति कुण्ड, सुतीक्षण आश्रम, अग्निजिह्वा आश्रम, अगस्त्य आश्रम, सतना जिले का राम जानकी मंदिर, उमरिया जिले का मार्कण्डेय आश्रम, राममंदिर, दशरथ घाट, शहडोल जिले की सीतामढ़ी शामिल हैं।

तीसरा रूट- यह 378 किमी लंबा होगा। इसमें मैहर स्थित राम जानकी मंदिरए कटनी जिले का शिवमंदिर भरभरा, जबलपुर जिले का रामघाट, नर्मदापुरम जिले के श्रीराम मंदिर पासीघाट और श्रीराम मंदिर माच्छा शामिल हैं।

चौथा रूट- यह 476 किमी लंबा होगा। छत्तीसगढ़ सीमा के हरचोका से प्रारंभ होकर शहडोल जिले में सीतामढ़ी गंधिया, अनूपपुर जिले में सीतामढ़ी कनवाई से अमरकंटक होते हुए जबलपुर जिले के रामघाट पिपरिया तक जाएगा।

एक नजर इन तथ्यों पर भी-
249 जगह चिह्नित हैं देश में वनवासी प्रभु श्रीराम की। इसमें अयोध्या से लेकर धनुष कोटि तमिलनाडु तक और वापस लौटने तक के स्थान हैं।
13 राज्यों में चरण कमल सहित अन्य निशानियां हैं मौजूद।
23 जगह मध्यप्रदेश में हैं राम वन गमन पथ की।
09 जिले मध्यप्रदेश में हैं राम वन गमन पथ के। इनमें सतना, मैहर, पन्ना, कटनी, जबलपुर, नर्मदापुरम, उमरिया, शहडोल और अनूपपुर शामिल हैं।

स्रोत- श्री राम सांस्कृतिक शोध संस्थान न्यास