
,झलकारी बाई को उनके पिता ने घुड़सवारी, तीर चलाना और तलवारबाजी जैसे सभी युद्ध कौशल में पारंगत किया।
भोपाल. शहीद भवन में पीपुल्स थिएटर ग्रुप की ओर से वीरांगना झलकारी बाई नाटक का मंचन किया गया। इसका निर्देशन सिंधु धौलपुरे ने किया। आलेख ईलाशंकर गुहा का रहा है। नाटक में दिखाया कि झलकारी बाई ने देशप्रेम और स्वामी भक्ति का परिचय देते हुए अपने प्राणों की आहुति दे दी। नाटक में झलकारी के बचपन से लेकर उनके शहीद होने तक के जीवन को खुबसूरत दृश्यबंधों से दर्शाया गया। नाटक का संगीत कर्णप्रिय रहा जो दृश्यों को और भी प्रभावी बनाता गया।
वीर योद्धा थीं झलकारी बाई
नाटक में दिखाया गया कि जब झलकारी बाई बहुत छोटी थी तब उनकी मां की मृत्यु हो गई। पिता ने उन्हें एक पुत्र की तरह पाला। उन्हें घुड़सवारी, तीर चलाना, तलवार बाजी जैसे सभी युद्ध कौशल में पारंगत किया। झलकारी ने युद्ध कौशल की कोई औपचारिक शिक्षा नहीं ली थी पर किसी भी कुशल और अनुभवी योद्धा से कम नहीं थी। मेघवंशी समाज में जन्मी झलकारी घर के काम के अलावा पशुओं की देख-रेख और जंगल से लकड़ी इएकत्रित करने का काम भी करती थी। एक बार जंगल में अपनी सहेलियों के साथ लकड़ी बीनते समय झलकारी की मुठभेड़ एक बाघ से हो गई। अपनी सहेलियों की जान बचाने के लिए उन्होंने अपनी कुल्हाड़ी से उसे मार गिराया।
झलकारी बिल्कुल रानी लक्ष्मीबाई की तरह ही दिखती थीं
नाटक में दिखाया गया कि झलकारी जितनी बहादुर थी उतने ही बहादुर सैनिक से उनका विवाह हुआ। यह वीर सैनिक थे पूरन कोरी, जो झांसी की सेना में अपनी बहादुरी के लिए प्रसिद्ध थे। विवाह के बाद जब झलकारी झांसी आई तो एक बार गौरी पूजा पर गांव की अन्य महिलाओं के साथ वह भी महारानी को सम्मान देने झांसी के किले में गईं। वहां जब रानी लक्ष्मीबाई ने उन्हें देखा तो वह दंग रह गई। झलकारी बिल्कुल रानी लक्ष्मीबाई की तरह ही दिखती थीं। साथ ही जब रानी ने झलकारी की बहादुरी के किस्से सुने तो उनसे इतनी प्रभावित हुई कि उन्होंने झलकारी को तुरंत ही दुर्गा सेना में शामिल करने का आदेश दे दिया।
Updated on:
14 Mar 2022 11:54 pm
Published on:
14 Mar 2022 11:49 pm
