मैं तो अहिंसा का पुजारी था, दान, पूजा और मन्दिर का संरक्षण करना मेरा धर्म था। मेरे इन्हीं पुण्य कर्मों के कारण मैं भविष्य का तीर्थंकर बनने वाला हूँ। क्या मुझे जलाने वालों में से कोई है जो वास्तविकता में अहिंसा धर्म का पालन करता हो, फिर क्यों कर मुझे जलाते हो! मेरा अनादर करने, मेरे पुतले को जलाने से मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। तुम अपने लिए ही अशुभ कर्म का बन्ध बना रहे हो, अपने परिणाम बिगाड़ रहे हो, कहीं ऐसा ना हो कि भविष्य में तुम भी मेरी ही तरह जलाए जाओ।