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दशानन @ 10: मैं रावण… दानी, अहिंसक और धर्म संरक्षक!

अरे, आपको तो फर्क ही नहीं पड़ता अगर आप किसी कार्य पर जा रहे हैं और रास्ते में किसी की दुर्घटना को होते देख लेते हैं तो भी उस इंसान की मदद को आगे नहीं आते, कहते हैं इतना समय नहीं देर हो रही है।

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Manish Geete

Oct 06, 2016


मैं दिग्विजय पर था, तब अचानक दूत से समाचार मिला कि राजा मरुत्व संर्वत ब्राह्मणों के साथ मिलकर हिंसक यज्ञ कर रहा है, जिसमें निरीह पशुओं की बलि दी जानी है। ऐसा न करने को जब नारद उन्हें समझाने पहुँचे तो उन्हें भी राजा ने पीटा। यह सुनते ही मैं अपनी सेना के साथ यज्ञ भूमि पर पहुँच गया।

मैनें वहाँ हो रही हिंसा के खिलाफ आवा़ज उठाई राजा और ब्राह्मणो को समझाया जब वो नहीं माने तो मेरी सेना ने उन्हें दण्ड दिया और फिर उन्हें समझाया कि जब तुम्हें इस दण्ड से तकलीफ हो रही है तो यज्ञ में पशुओं की बलि देने पर क्या उन्हें कष्ट नहीं होगा। किसी भी प्राणी को कष्ट देने वाली कोई क्रिया धर्मसम्मत नहीं हो सकती। ये धर्म नहीं अधर्म है। आपसे यहाँ प्रश्न करूँ... मैं तो अपना सारा काम काज छोड़ हिंसा को रोकने पहुँच गया। पर क्या आप अपना कोई भी काम छोड़ किसी की मदद को पहुँचते हैं।




अरे, आपको तो फर्क ही नहीं पड़ता अगर आप किसी कार्य पर जा रहे हैं और रास्ते में किसी की दुर्घटना को होते देख लेते हैं तो भी उस इंसान की मदद को आगे नहीं आते, कहते हैं इतना समय नहीं देर हो रही है। जब इंसानों के लिए आपके मन में दया नहीं तो पशुओं का क्या है, आप तो उनकी चमड़ी और फर से बने कई सामान पैâशन के नाम पर उपयोग करने में भी नहीं हिचकते फिर भला... आप मुझे जलाने के अधिकारी वैâसे हो सकते हैं? जानते हो अगर वो हिंसक यज्ञ हो गया होता तो अनर्थ हो जाता, मैं तो ऐसे कई कार्य अपने अतिमहत्वपूर्ण कार्यों को रोक कर भी पूर्ण करता था लेकिन आप नहीं समझ सकते। आप अपने मतलब के आगे सारी गलियाँ निकाल लेते हो।




चलो दूसरे बिंदु पर आते हैं मेरी अठारह वर्ष की दिग्विजय यात्रा पर मैनें धर्म के नाम पर कोई बुरा कार्य नहीं किया। बल्कि उस दौरान जहाँ कहीं मुझे जीर्ण-क्षीर्ण जिन मंदिर मिलते मैं उनका जीर्णोद्धार करवाता, पर कभी पूरा मंदिर तोड़ उसे नया रूप देने के लिए मैनें उसका विध्वंस नहीं करता क्योंकि मैं जानता था कि इतिहास मंदिरों की शिल्पकला और उनकी प्राचीनता से है इसलिए सदा प्राचीन को उसी स्वरूप में रखकर ठीक करवाया। साथ ही जहाँ मंदिर नहीं थे और आवश्यकता थी वहाँ मैनें नए मंदिरों का निर्माण भी करवाया। जो अशक्त मिले, जरूरत मंद मिले उन्हें दान देकर मदद की ना कि उन्हें गुलाम बनाकर रखा।


मेरे बसाए स्वयंप्रभ नगर में चन्द्रप्रभ भगवान का चैत्यालय था । लंका में कई जिनमंदिर और चैत्यालय थे। लंका के मेरे महल में शांतिनाथ भगवान का चैत्याल्य था जहाँ पर बैठकर मैनें बहुरुपिणी विद्या सिद्ध की थी । इतना ही नहीं मेरे पुष्पक विमान में भी चैत्यालय था। तुम बताओ क्या धर्म साधना के आधारभूत भगवान मेरे जीवन का अहम हिस्सा थे, क्या आपके जीवन में ऐसा है?

आपके घरों में तो भगवान का स्थान तक नहीं है और तो और जिनमंदिर जाने का नियम भी आपकी सुविधा के अनुसार चलता है। जिनबिंब दर्शन के बिना आपका मन वैâसे निर्मल हो सकता है। जिस घर में भगवान का स्थान नहीं, वह घर कैसे हो सकता है वह वन ही है।

मैं तो अहिंसा का पुजारी था, दान, पूजा और मन्दिर का संरक्षण करना मेरा धर्म था। मेरे इन्हीं पुण्य कर्मों के कारण मैं भविष्य का तीर्थंकर बनने वाला हूँ। क्या मुझे जलाने वालों में से कोई है जो वास्तविकता में अहिंसा धर्म का पालन करता हो, फिर क्यों कर मुझे जलाते हो! मेरा अनादर करने, मेरे पुतले को जलाने से मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। तुम अपने लिए ही अशुभ कर्म का बन्ध बना रहे हो, अपने परिणाम बिगाड़ रहे हो, कहीं ऐसा ना हो कि भविष्य में तुम भी मेरी ही तरह जलाए जाओ।



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