
संविदा पर रिटायर्ड अफसर, बढ़ती जा रही है बेरोजगारी
भोपाल. सरकारी खर्च में कमी करने के लिए लाई गई संविदा नियुक्ति की नीति अब अपने चहेतों को उपकृत करने का माध्यम बनती जा रही है। यही कारण है कि, अब कई सरकारी विभागों और कार्यालयों में सेवानिवृत्त कर्मचारियों-अधिकारियों को दोबारा संविदा नियुक्तियां दी जा रही हैं।
विशेषज्ञता वाले क्षेत्र में तो ये ठीक है क्योंकि विशेषज्ञ आसानी से नहीं मिलते हैं। लेकिन, सामान्य कामकाज वाले विभागों में भी ये खेल शुरू हो गया है। यहां तक कि, कई विभागों और संस्थानों में नियुकतियों में रिटायर्ड कर्मचारियों को प्राथमिकता दी जा रही है।
खास बात यह भी है कि, न तो पहले से संविदा पर काम करने वाले कर्मचारियों को नियमित किया जा रहा है और न बेरोजगार युवाओं को मौका दिया जा रहा है। जबकि, प्रदेश में अभी 28 लाख बेरोजगार हैं। कर्मचारी संगठनों ने भी इसका विरोध शुरू कर दिया है, लेकिन उनकी भी सुनवाई नहीं हो रही है।
ऐसे समझें स्थिति नापतौल कार्यालय
नापतौल विभाग के कई अधिकारी कर्मचारी सेवानिवृत्त होने के बाद संविदा नियुक्ति के लिए प्रयासरत हैं। यहां अभी 202 पद रिक्त हैं। कुछ सेवानिवृत्त निरीक्षक दोबारा संविदा नियुक्ति के लिए प्रयास कर रहे हैं। उनकी नियुक्ति की प्रक्रिया चल रही है। जबकि, भर्ती हो तो बेरोजगार युवाओं को यहां मौका मिल सकता है और कामकाज में भी नयापन आएगा। इस संबंध में नियंत्रक नापतौल केदार सिंह का कहना है कि, नियुक्तियां शासन के नियमानुसार ही की जाएंगी।
डेढ़ लाख संविदा कर्मचारी इंतजार में
मध्य प्रदेश संविदा अधिकारी-कर्मचारी महासंघ के अध्यक्ष रमेश राठौर के अनुसार, प्रदेश में अभी 1 लाख 46 हजार संविदा कर्मचारी हैं। इन्हें नियमित पदों पर पहले नियुक्ति मिलना चाहिए, क्योंकि इन्हें सालों का अनुभव भी है। इसके साथ भर्ती में बेरोजगार युवाओं को मौका मिलना चाहिए। अभी तक केवल जन अभियान परिषद के 416 संविदा कर्मचारियों को भाजपा और आरएसएस से संबद्धता के चलते नियमित किया गया है, लेकिन अन्य कर्मचारी अभी भी इंतजार कर रहे हैं।
बेरोजगारों को मिले मौका
तृतीय वर्ग कर्मचारी संघ नापतौल विभागीय समिति के अध्यक्ष उमाशंकर तिवारी ने बताया कि, रिटायर्ड लोगों को संविदा नियुक्ति देने से बेरोजगारी और बढ़ेगी। इसलिए पदों के लिए भर्ती की जाना चाहिए, ताकि युवा बैरोजगारों को मौका मिल सके। जिन पदों पर प्रभार देकर पूर्ति की जा सकती है तो प्रभार भी दिए जा सकते हैं। संघ इसका लगातार विरोध कर रहा है। हमने इस संबंध में सीएम, सीएस आदि को शिकायत दर्ज कराई है।
और जजों के लिए 65 साल तय की गई है। सदस्य पर नियुक्ति के लिए 15 साल की प्रेक्टिस अनिवार्य की गई है। जबकि, अध्यक्ष के लिए 7 साल की प्रेक्टिस मान्य की गई है।
यहां पे माइनस पेंशन के कारण भी अजीब स्थिति बन रही है। क्योंकि सदस्यों का जो वेतन तय है उससे ज्यादा तो इन रिटायर्ड अधिकारियों को पेंशन मिल रही है। इस मामले में राज्य उपभोक्ता आयोग के रजिस्ट्रार राजीव आपटे का कहना है कि, नियुक्तियों में शासन जो निर्णय लेगा वही लागू किया जाएगा।
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Published on:
22 Mar 2022 04:46 pm
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