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स्टाइल स्टेटमेंट ईयर फोन का यूज कर रहे हैं तो सावधान! हो सकते हैं बहरेपन का शिकार

आप निर्धारित स्तर व समय के लिए वह ध्वनि उपकरणों का इस्तेमाल कर सकते हैं....

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भोपाल। आस-पास कान में ईयरफोन लगाए हुए कई सारे लोग रोजाना दिखते होंगे। यही स्टाइल स्टेटमेंट युवाओं को बहरा बना रहा है। हाल ही में 12वी कक्षा में पढ़ने वाले राहुल श्रीवास्तव (बदला हुआ नाम) को कान सीटी बजने जैसा लग रहा था। आराम न मिलने पर उन्होंने इसके बारे में माता-पिता को बताया। जिसके बाद वह राहुल को लेकर अस्पताल पहुंचे। जांच में सामने आया कि कान की नसें रोजाना घंटों तक ईयर फोन लगाने के चलते कमजोर हो गई हैं। जिससे सुनने की शक्ति भी प्रभावित हुई है। डॉक्टरों के अनुसार इस स्थिति में जो असर कानों पर पड़ा है, वह पूरी तरह सही नहीं हो सकता। ऐसे में अब जरूरी है कि आगे जो एहतियात रख सकते हैं, उन पर ध्यान दें। जिससे बची हुई सुनने की क्षमता को बचाया जा सके। ऐसा कोई अकेला मामला नहीं हैं अकेले हमीदिया अस्पताल में हर महीने 25 से 30 पीडित युवा आते हैं। नाक-कान-गला रोग विशेषज्ञ इसे चिंताजनक स्थिति मान रहे हैं।

बढ़ जाती है बहरेपन होने की संभावना

ईएनटी विशेषज्ञों के अनुसार स्टाइल स्टेटमेंट के रूप में ईयर फोन, हेड फोन, ईयर बड्स समेत अन्य उपकरणों को देखे जाने से यह समस्या बढ़ती जा रही है। बच्चे ऑनलाइन क्लास, गाने सुनने, कॉल पर बात करने से लेकर सोशल मीडिया चलाने तक इन ध्वनि उपकरणों का कई घंटें इस्तेमाल करते हैं। जिससे उनकी सुनने की शक्ती कम हो रही है। समय पर सचेत न किया जाए तो बहरेपन होने की संभावना बढ़ जाती है।

बढ़ते जा रहे हैं कान के पर्दे में सिकुड़न के मामले

ऐसे में माता-पिता आगे आने की जरूरत है। उन्हें बच्चों को समझाना होगा कि एक निर्धारित स्तर व समय के लिए वह ध्वनि उपकरणों का इस्तेमाल कर सकते हैं। न केवल ईयरफोन बल्कि बार, क्लब, म्यूजिक इवेंट में औसतन 100 डेसिबल से ज्यादा आवाज होती है। ऐसे में तेज आवाज में बज रहे गाने भी युवाओं के सुनने की क्षमता को प्रभावित कर रहे हैं। ऐसे में जरूरी है कि इन जगहों पर भी आवाज की ध्वनि को निर्धारित स्तर पर ही बजाया जाए। लगातार तेज आवाज में गाने सुनने से बिना एहसास के लोग बहरेपन का शिकार हो रहे हैं। वहीं जब एहसास होता है तब तक कोई इलाज भी नहीं बचता है। वहीं वाहनों के बढ़ते उपयोग से ध्वनि प्रदूषण का स्तर भी काफी बढ़ गया है, जो कानों पर गहरा असर डाल रहे हैं। वायु प्रदूषण से बार-बार एलर्जी होती है। जिससे कान के पर्दे में सिकुड़न के मामले बढ़ते जा रहे हैं।

डब्ल्यूएचओ: 2050 तक 70 करोड़ लोगों को हो सकती है सुनने की समस्या

डब्ल्यूएचओ के अनुसार दुनिया भर में कुल आबादी के 5 फीसदी लोगों यानि लगभग 43 करोड़ सुनने की समस्या से ग्रसित हैं। साथ ही एक अनुमान लगाया गया है, जिसके अनुसार 2050 तक यह संख्या 70 करोड़ लोगों तक जा सकती है।

पेरेंट्स रखें इन बातों का ध्यान

● बच्चों को समझाना होगा कि जहां तक संभव हो, फोन, लैपटॉप में लगे स्पीकर का ही इस्तेमाल करें

● बच्चे निर्धारित समय से अधिक हेडफोन का इस्तेमाल करें तो उन्हें समझाएं यह खतरनाक है

● परिजन खुद बच्चों के सामने लंबे समय तक हेडफोन व ईयर फोन का इस्तेमाल न करें

● यदि वह अकेले में फोन पर बात कर रहे हैं तो उन्हें निजी स्पेस दें, जिससे वह हेडफोन के इस्तेमाल से दूर रहें।

डॉ. यशवीर जेके, ईएनटी विशेषज्ञ, हमीदिया अस्पताल का कहना है कि मानक से ज्यादा ध्वनि प्रदूषण तो सीधे कानों को प्रभावित करता है। अकसर जिम व जुंबा के दौरान तेज आवाज में रहने से कान की नसों पर प्रभाव पड़ता है। हर महीने 20 से 25 युवा ऐसे आते हैं जिनको हेडफोन के अधिक इस्तेमाल के बाद कान में सीटी बजने जैसा महसूस होता है। कई मामलों में जांच में सामने आया कि उनकी कान की नसों पर असर पड़ा है।