राजमाता के मुताबिक दुनिया में कितना दुख और दैन्य भरा है, इसकी अनुभूति मुझे जेल में हुई। हर किसी की व्यथा कथा सुनकर कलेजा मुंंह को आ जाता। उन महिलाओं के जीने का न कोई अर्थ था, न जिंदगी का गंतव्य। वे सार्वजनिक उपयोग की एक वस्तु मात्र थीं। जेल में जब जिसका उन पर जी आ गया, उठा ले गया और अपनी काम पिपासा शांत कर पुन: उसी स्थान पर फेंककर चला गया। जब मैंने उनमें रुचि दिखाई, उन्हें बड़ा सहारा मिला। मैंने जेल में बच्चों को कपड़े, दवाइयां और खेल के सामान बांटे।