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Rajasthan: प्रदेश की 90 शहरी सरकारें इसी माह होंगी समाप्त, सिर्फ एक पर बचेगी जनप्रतिनिधि की सत्ता, चुनाव को लेकर सियासत गरम

Rajasthan Nagar Nikay Elections: हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट सरकार को अप्रेल तक नगरीय निकाय चुनाव कराने के निर्देश दे चुके हैं, लेकिन अब तक सरकार चुनाव की तारीखों को लेकर कोई स्पष्ट रोडमैप तय नहीं कर पाई है।

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जयपुर

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Kamal Mishra

Jan 02, 2026

Rajasthan Nikay Chunav

फोटो-पत्रिका

जयपुर। राजस्थान में शहरी राजनीति एक बड़े बदलाव के दौर में पहुंच गई है। प्रदेश में चुनी हुई शहरी सरकारें (नगरीय निकाय बोर्ड) लगभग समाप्ति के कगार पर हैं और उनकी पूरी कमान अफसरशाही के हाथ में आने वाली है। जनवरी में ही प्रदेश के 90 नगरीय निकायों का कार्यकाल पूरा हो रहा है, जिनमें 3035 वार्ड शामिल हैं। इसके बाद केवल एक निकाय (झुंझुनूं की नगरपालिका विद्याविहार) बचेगी, जिसका कार्यकाल भी फरवरी में समाप्त हो जाएगा।

इसके साथ ही प्रदेश के इतिहास में पहली बार ऐसी स्थिति बनेगी, जब (नवगठित निकायों को छोड़कर) सभी 196 नगरीय निकायों में कोई निर्वाचित बोर्ड नहीं रहेगा। यानी पूरी शहरी व्यवस्था जनप्रतिनिधियों के बजाय प्रशासनिक अधिकारियों के नियंत्रण में होगी। अभी तक 105 नगरीय निकायों में प्रशासक नियुक्त हैं, जबकि नवगठित 113 निकायों की बागडोर पहले से ही प्रशासकों के हाथ में है। पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार में 196 नगरीय निकायों के चुनाव हुए थे।

चुनाव को लेकर असमंजस, सियासत गरम

राजनीतिक दृष्टि से यह स्थिति बेहद अहम मानी जा रही है। हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट सरकार को अप्रेल तक नगरीय निकाय चुनाव कराने के निर्देश दे चुके हैं, लेकिन अब तक सरकार चुनाव की तारीखों को लेकर कोई स्पष्ट रोडमैप तय नहीं कर पाई है। इसी असमंजस ने विपक्ष को सरकार पर हमला करने का मौका दे दिया है।

स्थानीय राजनीति पर असर

  • पार्षदों और चेयरमैन की भूमिका समाप्त होने से जनता और शासन के बीच की सीधी राजनीतिक कड़ी कमजोर हो रही है।
  • विकास कार्यों और नीतिगत फैसलों में निर्वाचित प्रतिनिधियों की जगह अब अफसर निर्णय ले रहे हैं।
  • जनता की सबसे बड़ी चिंता यह है कि अब रोजमर्रा की समस्याएं किससे कहेंगे, क्योंकि अभी तक वार्ड पार्षद तक सीधी पहुंच रहती थी।

चुनाव तक नीतिगत फैसलों पर रोक क्यों नहीं?

  • लोकतंत्र में जनप्रतिनिधियों के अधिकार अफसरों के हाथ में क्यों दिए जा रहे हैं?
  • जब तक चुनाव और बोर्ड नहीं बन जाता, तब तक नीतिगत फैसलों और बड़े टेंडरों पर रोक क्यों न लगे?
  • निकायों में ऐसे स्थिति बनती है तो कामकाज की स्पष्ट गाइडलाइन क्यों न तय की जाए?
  • निकायों के बैंक खातों से निकासी पारदर्शी हो, यानि सुरक्षित रहें।
  • म्यूनिसिपल एक्ट की अवहेलना करने वालों पर कार्रवाई क्यों नहीं, जबकि इसमें तत्काल चुनाव कराने का प्रावधान है?