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सफाई कामगार आयोग : चुंगी क्षतिपूर्ति के पैसों से कर रहे दौरा और स्टेशनरी खर्च

आयोग का बजट दो लाख, गाडिय़ों का खर्च 28 लाख

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भोपाल। सरकार चुंगी क्षतिपूर्ति विकास निधि का जो पैसा नगरीय निकायों को सडक़-पानी जैसी मूलभूत सुविधाएं जनता को मुहैया कराने के लिए देती है, वह सफाई कामगार आयोग के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष की गाडिय़ों के डीजल में खर्च हो रहा है। आयोग का सालाना बजट दो लाख रुपए है। जबकि, उसके अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के वाहन का व्यय ढाई लाख रुपए महीना है। सरकार ने सफाई कामगार आयोग के अध्यक्ष जटाशंकर करोसिया की नियुक्ति सात माह पहले की थी।

इसके बाद से इनकी गाड़ी हर महीने करीब छह से सात हजार किलोमीटर चल रही है, जिसका बिल सवा लाख रुपए महीना तक आ रहा है। कुछ इसी तरह से उपाध्यक्ष की गाड़ी भी दौड़ रही है। आयोग का कम्प्यूटर से लेकर स्टेशनरी तक का खर्च भी चुंगी क्षति पूर्ति निधि से उठाया जा रहा है। बजट के अभाव के चलते अध्यक्ष और उपाध्यक्ष को मानदेय भी अभी तक नहीं दिया गया है।

कम्प्यूटर कुर्सी घर ले गए उपाध्यक्ष

आयोग के उपाध्यक्ष सूरज खरे पदभार ग्र्रहण करने के बाद ऑफिस का कम्प्यूटर, प्रिंटर, कुर्सी टेबल अपने घर उठा ले गए। इतना ही नहीं वे कर्मचारियों को अपने घर बुलाकर काम भी करवाते हैं। पिछले महीने आयोग के सचिव ने उन्हें ऑफिस में कम्प्यूटर रखने के लिए पत्र लिखा था, लेकिन उन्होंने कम्प्यूटर देने से इनकार कर दिया है।

आठ माह में सौ से अधिक दौरे
सफाई कामगार आयोग के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष सौ से अधिक दौरे कर चुके हैं, लेकिन आयोग की तरफ से सफाई कामगारों के लिए एक भी सुझाव शासन को नहीं दिया जा सका। अभी तक आयोग सफाई कर्मचारियों के पास तक भी नहीं पहुंचा। उनके उत्थान के लिए कोई ठोस नीति बनाकर आयोग ने अभी तक शासन को नहीं सौंपी है।

क्या है चुंगी क्षतिपूर्ति
चुंगी क्षति पूर्ति नगरीय निकायों की विकास निधि होती है। पहले बाहर से निकायों की सीमा में आने वाले वाहनों से चुंगी कर वसूला जाता था, लेकिन सरकार ने कुछ सालों से इस पर प्रतिबंध लगाते हुए नगरीय निकायों को एकमुश्त क्षतिपूर्ति के रूप में पैसा देना शुरू किया है, ताकि वे विकास कार्य करवा सकें।

दौरा करेंगे तो गाडिय़ां चलेंगी ही
करोसिया का कहना है कि दौरा करेंगे तो गाडिय़ां चलेंगी ही। बिल भी बढ़ेगा। सफाई कामगारों के उत्थान के लिए छह माह में करीब 200 पत्र सरकार और प्रमुख सचिव को लिख चुके हैं, लेकिन कोई जवाब सरकार की तरफ से नहीं आया। छह माह में पीएस विवेक अग्रवाल ने एक बार मिलने का समय दिया, लेकिन मिलने पर कहा कि चलते-चलते बात करेंगे। लिफ्ट में मात्र एक मिनट की बात हुई और वह गाड़ी में बैठकर निकल गए।

हमारे पत्र लेने के लिए अधिकारी तैयार नहीं होते हैं। पत्रवाहक को मंत्रालय और डायरेक्ट्रेट के बीच में घुमाया जाता है। करोसिया ने कहा कि हमें छह माह से मानदेय नहीं मिला है। ऑफिस नहीं है, स्टाफ नहीं दिया गया। सरकार ने दो लाख का बजट आवंटित किया था, एक करोड़ के बजट का प्रस्ताव आयोग ने दिया था, जिसमें 18 लाख रुपए का बजट दिया है, जो पैसे अभी तक नहीं आया।

सचिव इंदौर से आयोग चलाना चाहते हैं। आयोग कार्यालय में कोई कर्मचारी नहीं मिलता है। इसके चलते कम्प्यूटर घर ले गया हूं। ग्वालियर में आयोग की बैठक हुई थी, जिसमें सदस्य को हटाने का प्रस्ताव पास किया गया है।
-सूरज खरे, उपाध्यक्ष, सफाई कामगार आयोग

डायरेक्ट्रेट में आयोग के लिए कोई नोडल अधिकारी नहीं होता है। आयोग कार्यालय का हैड प्रमुख सचिव होता है। मेरे पास आयोग के कोई भी सुझाव सचिव के माध्यम से नहीं आए हैं। बजट बनाकर वित्त अधिकारी के माध्यम से शासन के पास भेजा गया था, लेकिन अभी बजट नहीं आया है।
-पीएन पांडे, अपर संचालक, नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग