
ट्यूबरक्लोसिस, यानी टीबी...अमूमन इसे फेफड़े के बीमारी के तौर पर जाना जाता है। लेकिन यह सच नहीं है। यह आंखों तक पहुंचकर रोशनी छीन रहा है। यह इतना खतरनाक है कि इसकी पहचान तक मुश्किल है। गांधी मेडिकल कॉलेज (GMC) में चल रहे शोध के शुरुआती परिणाम में यह सामने आया है। नेत्र विभाग की टीम ने डेढ़ साल में ऐसे 57 मरीजों की न सिर्फ पहचान की है, बल्कि सफल इलाज कर उनके आंखों की रोशनी भी बचाई। शोध कर रहे डॉक्टरों की मानें तो, आंखों की टीबी के 70 फीसदी से अधिक मरीजों में बीमारी पकड़ में ही नहीं आती।
असिस्टेंट प्रो. एसएस कुबरे के निर्देशन में शोध में कर रहीं आरएसओ डॉ. दुर्गा पांडे का कहना है, माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरक्लोसिस बैक्टीरिया टीबी के लिए जिम्मेदार हैं। आंखों की टीबी की पहचान के लिए कोई जांच नहीं है। बलगम की रिपोर्ट निगेटिव आने पर भी मरीज आंखों की टीबी से ग्रस्त मिले। टीबी की पहचान के लिए डॉक्टर अन्य बीमारियों की जांच करते हैं। सभी रिपोर्ट निगेटिव होने पर आंखों में टीबी पहचान होती है। आईजीआरए जांच से मदद मिलती है।
- आंखों का धुंधलापन
- आंखों का चौंधियाना
- आंखों में दर्द के साथ लाल होना
- काले धब्बे दिखना
डब्लूएचओ (WHO) के अनुसार 2023 में दुनिया में प्रति एक लाख में से 210 मरीज टीबी के मिले। देश में यह आंकड़ा 197 हैं। इनमें से 8 फीसदी आंखों की टीबी के लक्षण मिले। शोधार्थी डॉ. दुर्गा पांडे का कहना है लक्षण शुरू होने के दो-चार सप्ताह में इलाज मिले तो आंखों की रोशनी बचाई जा सकती है।
Updated on:
14 Apr 2024 10:48 am
Published on:
14 Apr 2024 08:32 am
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