
भोपाल. बिरला मंदिर संग्रहालय में रामायण, महाभारत सहित अन्य कई ग्रंथों की हस्तलिखित पांडुलिपि मौजूद हैं। बताया जाता है कि सातवीं शताब्दी ई.पू. यह सभी ग्रंथ ताड़ के पत्ते पर लिखे थे। बाद में लुप्त होने से बचाने के लिए इन्हें कागज की शीट से बदल दिया गया है। देवनागरी भाषा, संस्कृत व फारसी भाषा में लिखी 250 वर्ष तक पुरानी ये पांडुलिपि महाकाल की नगरी उज्जैन से लाई गई थीं। वहीं कुछ पांडुलिपि स्थानीय निवासियों के घरों में मौजूद थीं, जिन्हें उन्होंने इस संग्रहालय को दान किया है। अब तक 300 से अधिक पांडुलिपि इस संग्रहालय की धरोहर बन चुकी हैं।
52 साल से संग्रहालय में सुरक्षित
बिलरा मंदिर का निर्माण वर्ष 1971 में हुआ था, उस समय से ही पहाड़ी पर बने इस संग्रहालय में इतिहास व साहित्य के दुर्लभ दस्तावेज संरक्षित किए गए हैं। साथ ही प्रदेश के कई गांवों का इतिहास भी यहां संरक्षित है। संग्रहालय के प्रथम तल पर इतिहास, संस्कृति व धर्म से जुड़ी प्राचीन वस्तुएं उपयोग की विलुप्त सामग्री, पुराने सिक्के और डाक टिकट रखे हुए हैं।
6-7 ईसवी की मूर्तियां भी संग्रहालय में
इस संग्रहालय में कई हजार साल पुरानी मूर्तियां संरक्षित हैं। संग्रहालय प्रबंधन ने बताया कि यहां 6-7 ईसवी पुरानी मूर्तियां भी हैं, जो खोज के दौरान खंडित पाई गई थीं। यहां में मध्य भारत की बहुत सारी पुरातात्विक वस्तुएं हैं और यहां की मूर्तियां भोपाल और उसके पास के क्षेत्रों से हैं, जैसे कि विदिशा, रायसेन, सीहोर, मंदसौर, आशापुरी, समसगढ़, मुरैना आदि। इनमें मुख्य रूप से शिव-पार्वती, विष्णु, जैन, देवी आदि प्रकार की मूर्तियां हैं।
समय-समय पर होता है केमिकल का उपयोग
संग्रहालय प्रबंधक केके पांडे बताते हैं कि संग्रहालय में पांडुलिपि दान करने वाले हर व्यक्ति का रिकॉर्ड रखा जाता है। इन पांडुलिपियों को थाइमोल और क्लोरोजिन नामक केमिकल से सुरक्षित किया जाता है, ताकि दीमक या अन्य जीव और कीट इन्हें खराब न कर दें।
Published on:
27 Dec 2023 06:49 pm
