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देश का एकलौता आर्ट वर्क, जिसमें लोक धुनों और कथाओं को सुनकर कलाकार तैयार करता है पेंटिंग

लोक गीतों की धुनों को कल्पना में पिरोकर उकेरी जाती हैं आकृतियां, मानव संग्रहालय में भील चित्रों में रंगों का संयोजन सीख रहे प्रतिभागी

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tribal artwork

भोपाल. मानव संग्रहालय में संग्रहालय शैक्षणिक कार्यक्रम 'करो और सीखो' के तहत भील चित्रकला की कलाकार गंगू बाई प्रतिभागियों को कला की बारिकियां सीखा रही हैं। उन्होंने बताया कि पिथौरा पेंटिंग को पिठोरा भी कहा जाता है, यह भील जनजाति की एक विशिष्ट कला है। इसमें ध्वनि सुनना और उसे आकृति के रूप में उकेरने का प्रदर्शन किया जाता है। यह कला भारत में एकमात्र ऐसी कला है, जिसमें विशिष्ट ध्वनि सुनना, उसे समझना और लेखन से चित्र रूप प्रदान करना प्रमुख है। भील समाज में पिथौरा सजावट के चित्र नहीं हैं, यह विशिष्ट धार्मिक अनुष्ठान है, जिसमें चित्रकार अपने मन से कोई रूपांकन नहीं करता। गांव के पुजारी या बड़वा के चित्रों से संतुष्ट होने के बाद ही इसे पूरा माना जाता है। भील आख्यानों में घोड़ा पिथौरा हमेशा केंद्र में ही होता है।

प्रतिभागी रितेश चौधरी ने बताया कि देश की हजारों साल पुरानी भील चित्रकला को जानने का यहां मौका मिला है। भील कला को कहानी, रंगो और आकारों के माध्यम से जान रही हूं। इस समृद्ध विरासत को लुप्त होने से बचाने के लिए युवा पीढ़ी की इसमें रुचि जागृत करना होगी। वहीं, प्रमिला श्रीवास ने बताया कि भील पेंटिंग के माध्यम से मुझे ट्राइबल लाइफ और करीब से जानने का मौका मिला है। मैं अपना बुटिक चलाती हूं। इन डिजाइन्स को कपड़ों पर उकेरुंगी। आज के दौर में ट्राइबल डिजाइन वाले आउटफिट्स का यूथ में काफी ट्रेंड भी है। प्रतिभागी वर्षा जोशी ने बताया कि मैं गृहणी हूं, मुझे बचपन से ही रंगों से प्यार है। जनजातीय चित्रकला रंगों और कथाओं का एक ऐसा संयोजन है जो हमें अपनी जड़ों से जोड़ता है। अपनी कल्पनाओं के लोक में खोकर आप रंगों को कैनवास पर नहीं जीवन में भरते हैं। इस कार्यशाला में मुझे नई बातों को जानने का मौका भी मिल रहा है।