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पीतल को सोना बनाने के महार्थी हैं यहां के लोग, पर इसलिए खो रहे हैं अपनी पहचान

पीतल की कारीगरी में देशभर में ख्याति रखने वाले इन ग्रामीणों के सामने महंगाई और संसाधनों की मार के चलते आजीविका चलाना भी एक बड़ी चुनौती बन गई है।

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भोपाल/नरसिंहपुरः देश में पीतल उद्योग के रूप में पहचाना जाने वाला नरसिहंपुर जिले के गाडरवारा का बाबई चीचली गांव बढ़ती महंगाई के चलते बुरे दौर से गुजर रहा है। यहां के ग्रमीण सिर्फ पीतल की कारीगरी जानते हैं, कई लोगों को इसके अलावा कोई और काम भी नहीं आता, इस कारण इनके सामने आज आजीविका चलाना बड़ी चुनौती बन गई है। इसी के चलते इस गांव की बड़ी आबादी यहां से पलायन करने को मजबूर है।

कारीगरी पर लगा महंगाई का 'ग्रहण'

अब से कुछ साल पहले तक मध्य प्रदेश के नरसिहंपुर जिले के बाबई चीचली गांव के हर घर से टक-टक की आवाज आना आम बात थी, इसके पीछे की वजह थी, इनका काम। ये लोग पीतल की कारीगरी में देशभर में ख्याति रखते हैं। लेकिन अब हालात ये हैं कि, महंगाई और संसाधनों की मार झेल रहे इस गांव के हर परिवार के सामने आजीविका चलाना एक बड़ी चुनौती बन गई है। इसी वजह से गांव में अब कुछ ही परिवार ऐेसे हैं जहां पर ये काम बाकी है। पीतल को सोने की चमक देने की महारत रखने वाले इस गांव के ग्रामीण अब खुद की चमक खो चुके हैं। यही वजह है कि अब तक इस गांव के करीब 500 परिवार इस व्यवसाय से किनारा कर चुके हैं, तो वहीं लगभग 40 परिवार ही है जो इस व्यवसाय से जुड़कर अपना गुजारा जैसे-तैसे कर रहे हैं और अपने गांव की पहचान को बरकरार रखने की जद्दोजहद में लगे हुए हैं।

500 परिवारों ने छोड़ा व्यवसाय

आज से कुछ साल पहले की अगर बात करें तो, इस गांव में देश के कोने-कोने से व्यापारी पीतल से बने बर्तन लेने चीचली आते थे, लेकिन आज के हालात इसके उलट हैं। अब यहां के ग्रामीण पहले तो लागत लगाकर पीतल खरीदते हैं, फिर उसे अपनी कारीगरी और महनत के बल पर एक सुंदर आकार देते हैं। इसके बाद वो बाजारों में इन्हें बेचने जाते हैं, जहां पहले से महंगाई की मार झेल रहा व्यापार उन्हें उसका उचिक मूल्य भी नहीं दे पाता। इसी के चलते ग्रामीण कई बार सरकार से पीतल उद्योग को बढ़ावा देने की मांग भी कर चुके हैं, लेकिन सरकार का इन लोगों को लेकर उदासीन रवय्यै के चलते ग्रामीणों के हाथ केवल निराशा ही आई है।

'पीतल' को 'सोने' की चमक देने में महारथी है ये गांव

यहां के कारीगर अपना हुनर पीढ़ी दर पीढ़ी बढ़ाते चले गए, क्या सिर्फ इसलिए कि, एक वक्त ऐसा आए जब अपने हाथ का वो हुनर, जो देशभर में प्रसिद्ध है उसे छोड़कर रोटी को भी मोहताज होना पड़े, पलायन करना पड़े। वक्त रहते प्रशासन अगर इस ओर ध्यान नहीं देता तो एक समय ऐसा आएगा, जब हमारे देश को पहचान दिलाने वाली ये चीज भी पुरानी और भी चीजों की तरह विलुप्त हो जाएगी।