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मध्य प्रदेश सरकार को चाहिए करीब 4000 डॉक्टर, 28 भी नहीं मिले

सरकारी अस्पतालों में विशेषज्ञ लाने का एक और प्रयास विफल, सीपीएस डिप्लोमा के लिए नहीं मिले डॉक्टर ...

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Govt doctors to hold demonstrations in June over NEET, PG quota issue

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भोपाल। मध्य प्रदेश इन दिनों डाक्टरों की कमी से जुझ रहा है। जहां एक ओर करीब 4000 डॉक्टरों की सरकारी अस्पतालों में कमी है। वहीं तमाम कोशिशों के बावजूद मध्यप्रदेश को 28 डॉक्टर भी नहीं मिल पा रहे है।

दरअसल मध्यप्रदेश में अभी 2249 विशेषज्ञ, 1677 मेडिकल आॅफिसर व 43 दंत चिकित्सकों के पद रिक्त पड़े है। जो कुल मिलाकर 3969 होते हैं।

इन्हीं सब स्थितियों को देखते हुए सरकारी अस्पतालों में विशेषज्ञों की कमी को दूर करने के लिए स्वास्थ्य विभाग का एक और प्रयास विफल हो गया। विभाग ने मुंबई की कॉलेज ऑफ फिजीशियन एंड सर्जन से अनुबंध कर मेडिकल ऑफिसरों को दो साल का पीजी डिप्लोमा कोर्स सीपीएस कराने का फैसला किया था। इसके लिए जिला अस्पतालों में 28 सीटें भी तैयार की, लेकिन 17 सीटें ही भरी जा सकीं।

सीटों को भरने स्वास्थ्य विभाग ने चार राउंड काउंसिलिंग भी की, इंटरव्यू भी लिए, इसके बावजूद सीट खाली रह गईं। स्वास्थ्य विभाग में प्रमोशन नीति में खासी विसंगति है।

मप्र मेडिकल ऑफिसर्स ऐसो के संरक्षक डॉ. ललित श्रीवास्तव बताते हैं प्रदेश में मेडिसिन, सर्जरी, गायनी, पीडियाट्रिक और एनिस्थिसिया के कई पद हैं। ऐसे में यहां पांच साल में पदोन्नति मिल जाती है। नेत्र रोग, रेडियोलॉजी, पैथोलॉजी और ईएनटी में 15 साल तक प्रमोशन नहीं मिलते।

विभाग करना चाहता है 98 सीटें

इस साल सीटें खाली रहने के बावजूद स्वास्थ्य विभाग सीपीएस डिप्लोमा की 28 सीटों को बढ़ाकर 98 करना चाहता है। विशेषज्ञों का कहना है कि जब विभाग में विसंगतियां और अस्पतालों की व्यवस्थाएं नहीं सुधरेंगी तब तक सीटें बढ़ाने से फायदा नहीं होगा।

पीजी सीटें बढऩे से लोग वहां चले गए

विशेषज्ञ डॉक्टर नहीं मिल पाने के पीछे विभाग के अधिकरियों का कहना है कि इस साल मेडिकल कॉलेजों की संख्या और पीजी सीट बढऩे सेे ज्यादा लोग वहां चले गए। सीपीएस डिप्लोमा कोर्स है, साथ ही जिला अस्पताल में हो रहा है। इस वजह से रुझान कम है।

यह हैं बड़े कारण...

: मेडिकल स्टडी मेडिकल कॉलेज में होती है, लेकिन इसकी पढ़ाई जिला अस्पताल में होगी।
: मेडिकल स्टडी के लिए मेडिकल टीचर्स होते हैं लेकिन यहां काम कर रहे डॉक्टरों को ही पढ़ाने का जिम्मा दिया गया है जो व्यवहारिक नहीं है।
: विभाग में प्रमोशन में विसंगति के चलते भी कोई इस कोर्स को नहीं अपनाना चाहता।
: मेडिकल ऑफिसर से विशेषज्ञ बनने से ना तो वेतनवृद्धि होती है ना ही अतिरिक्त लाभ। हालांकि दायित्व बढ़ जाते हैं।

यहां डिप्लोमा कोर्स

जेपी अस्पताल भोपाल, जिला अस्पताल सागर, जिला अस्पताल सतना, रानी दुर्गावती अस्पताल जबलपुर, कमला नेहरू गैस राहत अस्पताल भोपाल, इंदिरा गांधी गैस राहत अस्पताल भोपाल व मानसिक आरोग्यशाला ग्वालियर।

कब-कब हुए प्रयास : ज्वाइन करने के बाद नौकरी छोड़कर चले जाते हैं

: 2010 में मेडिकल ऑर्फीसर्स के 1090 पदों के विरुद्ध 570 डॉक्टर मिले थे। 200 ने नौकरी छोड़ दी।
: 2013 में 1416 पदों पर भर्ती में 865 डॉक्टर मिले, लेकिन करीब 200 ने ज्वाइन नहीं किया।
: 2015 में 1271 पदों में 874 डॉक्टर मिले हैं। इनमें भी 218 ने ज्वाइन नहीं किया।
: 2015 में ही 1871 पदों के भर्ती में वेटिंग वालों को मौका मिलने के बाद करीब 800 पद ही भरे।
: 2017 में पीएससी से हुई भर्ती में 1398 में से 400 डॉक्टर ही मिले।

सीपीएस डिप्लोमा की 28 सीटों के लिए काउंसिलिंग में 17 ही भरी गई। इस साल सीटें बढ़ा कर 98 की जानी थी, लेकिन अब अगले साल बढ़ाई जाएंगी।
- डॉ. राकेश मुंशी, ज्वाइंट डायरेक्टर, स्वास्थ्य विभाग