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हॉकी विश्वकप के दौरान बड़ी संख्या में आ सकते है पर्यटक,कोर्णाक सूर्य मंदिर को आकर्षक बनाने की तैयारी शुरू

हॉकी विश्वकप के दौरान भारी संख्या में पर्यटकों के आने की संभावना है...

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(पत्रिका ब्यूरो,भुवनेश्वर): ओडिशा के दर्शनीय स्थलों को चमकाया जाने लगा है। भुवनेश्वर में हॉकी विश्वकप प्रतियोगिता शुरू होने से पहले यह काम सरकार ने युद्ध स्तर पर कराना शुरू कर दिया। विश्व स्तर के पर्यटन स्थलों पर खास नजर है। हॉकी विश्वकप के दौरान भारी संख्या में पर्यटकों के आने की संभावना है।


मुख्यमंत्री नवीन पटनायक खुद इस प्रतियोगिता के अनौपचारिक रूप से ब्रांड एम्बेसडर बने हैं। पहला नंबर कोर्णाक के सूर्य मंदिर का है। यह ओडिशा का सबसे ज्यादा दर्शनीय स्थल है। हजारों की संख्या में रोज यहां पर पर्यटक आते हैं। इस साल नवंबर और दिसंबर का महीना राज्य में विकास के साथ ही पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण होगा। हॉकी विश्वकप 28 नवंबर से तो मेक इन ओडिशा कान्क्लेव 11 नंवबर से शुरू होगा।


सरकार का फोकस कोर्णाक पर है। पर्यटकों के लिए ओडिशा के उन धरोहरों की सूची तैयार की जा रही है जहां उन्हें घूमने के लिए ले जाया जा सकता है। शुरुआत कोर्णाक से हो चुकी है। पुरी जिला प्रशासन और एएसआई (भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण) ने कोर्णाक मंदिर में काम शुरू कर दिया। पुरी कलक्टर ज्योतिप्रकाश ने बताया कि उनकी एएसआई से मीटिंग हुई है। पहला काम तो यही है कि कोर्णाक को जलभराव मुक्त क्षेत्र करना है। देश विदेश से भारी संख्या में पर्यटकों के पुरी
आने की संभावना है। पुरी में विश्व धरोहर कोर्णाक और चिलिका झील भी है। इसके अलावा जगन्नाथ मंदिर भी है। यहां अंतर-राष्ट्रीय स्तर की सुविधाएं पर्यटकों को मुहैया करायी जाएंगी। आसपास की अतिक्रमण करने वाली दुकानें हटायी जाएंगी। इन्हें निकट ही बसाया जाएगा। चंद्रभागा समुद्र तट को भी सजाया जाएगा। एएसआई अधीक्षक अरुण मलिक ने बताया कि कोर्णाक को आकर्षक बनाने की तैयारी है। इसका पुरातन आकार प्रभावित नहीं होने दिया जाएगा।


कोर्णाक सूर्य मंदिर के बाहरी हिस्से में तराशे गए पत्थर काम की नयी परिभाषा गढ़ते हैं। इसके पीछे कहा जाता है कि सूर्य मंदिर के अंदर जाने वाले लोग सांसारिक सुख व अन्य सारी भावनाएं बाहर छोड़कर जाएं। यहां पर एक मिथक यह भी है कि रात में नर्तकियों के घुंघुरुओं की झनकार महसूस की जा सकती है। बताते हैं कि मंदिर अपने वास्तु दोषों के कारण आठ सौ साल में ध्वस्त होने लगा। वर्षों से इसका पुराना स्वरूप लौटाने की कोशिश जारी है। मंदिर का निर्माण रथ की आकृति होने से पूर्व दिशा, एवं आग्नेय एवं ईशान कोण खंडित हो गए। पूर्व से देखने से पता लगता है कि ईशान और आग्नेय कोणों को काटकर यह वायव्य एवं नैऋत्र्य कोणों की ओर बढ़ गया है।