
5 दशक बाद नक्सलमुक्त हुआ बस्तर (photo source- Patrika)
मो. इरशाद खान/CG Naxal Problem: भोपालपटनम बस्तर का वही रास्ता, जहां से कभी लाल आतंक ने दस्तक दी थी। इंद्रावती नदी पार कर 70 के दशक में नक्सली इसी कॉरिडोर से अंदर आए और धीरे-धीरे पूरे बस्तर को अपनी चपेट में ले लिया। गोलियों की गूंज, बारूदी सुरंगों और खौफ के साये में जीने वाला बस्तर आज एक नए दौर की ओर बढ़ रहा है।
करीब पांच दशक तक नक्सल हिंसा से जूझने के बाद अब यह क्षेत्र नक्सलमुक्ति की ऐतिहासिक दहलीज पर खड़ा है। 31 मार्च 2026 को देश के गृह मंत्री अमित शाह द्वारा संसद में नक्सलवाद के खात्मे की घोषणा के साथ ही बीजापुर इस बदलाव की सबसे बड़ी मिसाल बनकर उभरा है। एक समय था जब बस्तर के घने जंगलों में क्या हो रहा है, इसकी जानकारी केवल गोलियों की आवाज या आईईडी विस्फोटों से मिलती थी। सड़क निर्माण, स्कूलों का संचालन, गांवों का विकास हर चीज नक्सलियों की मर्जी पर निर्भर थी। शाम ढलते ही गांवों में सन्नाटा छा जाता था और लोग भय के कारण घरों में कैद हो जाते थे।
बस्तर में नक्सलवाद की जड़ें 1970 के दशक में पड़ीं, जब नक्सली भोपालपटनम और उसूर के रास्ते इंद्रावती नदी पार कर इस क्षेत्र में दाखिल हुए। 1972 में पोगल गांव से पहली गिरफ्तारी के साथ इसकी शुरुआत दर्ज हुई, जबकि 1974 में पोलमपल्ली में डकैती की घटना ने इसे संगठित रूप देना शुरू किया। जंगलों की आड़ और प्रशासनिक दूरी ने नक्सलियों को धीरे-धीरे मजबूत होने का अवसर दिया।
साल 2000 के बाद बस्तर में नक्सल हिंसा अपने चरम पर पहुंच गई। 2007 में रानी बोदली कैंप पर हमले में 55 जवान शहीद हुए। 2010 के ताड़मेटला हमले में 76 जवानों ने जान गंवाई। 2013 की झीरम घाटी घटना में महेंद्र कर्मा, नंदकुमार पटेल और विद्याचरण शुक्ल सहित कई बड़े नेता शहीद हुए। 2021 में तर्रेम मुठभेड़ में 22 जवानों की शहादत ने एक बार फिर पूरे देश को झकझोर दिया।
नक्सलवाद के खिलाफ 2005 में सलवा जुडुम आंदोलन शुरू हुआ, जिसमें स्व. महेंद्र कर्मा के नेतृत्व में हजारों ग्रामीण जुड़े। हालांकि 2011 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद यह आंदोलन बंद कर दिया गया। इसके बाद नक्सलियों ने कई ग्रामीण नेताओं को निशाना बनाया।
1980 और 1990 के दशक में नक्सलियों ने अपनी जड़ें गहरी कर लीं। पीपुल्स वार ग्रुप ने आंध्र (अब तेलंगाना) से अपनी गतिविधियां तेज कीं। 1983 में बेलकनगुड़ा के तेंदूपत्ता गोदाम में आगजनी और 1992-93 में भैरमगढ़ क्षेत्र में बढ़ते हमलों ने नक्सल प्रभाव को और विस्तार दिया। भैरमगढ़, उसूर, गंगालूर और तर्रेम जैसे इलाके नक्सलियों के गढ़ बन गए।
केंद्र और राज्य सरकार की सख्त नीति, लगातार सुरक्षा अभियानों और आत्मसमर्पण नीति के चलते अब बस्तर में हालात तेजी से बदल रहे हैं। बड़ी संख्या में नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है और कई इलाकों में पहली बार सड़क, स्कूल और स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंची हैं। आज बीजापुर, जो कभी नक्सल गतिविधियों का गढ़ माना जाता था, अब बदलाव की कहानी लिख रहा है। पांच दशक के खौफ के बाद बस्तर अब विकास, शांति और विश्वास की नई राह पर आगे बढ़ता नजर आ रहा है।
Updated on:
02 Apr 2026 12:29 pm
Published on:
02 Apr 2026 11:13 am
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