
15 साल की पदयात्रा ने बदली तस्वीर (फोटो सोर्स- पत्रिका)
CG News: नक्सल प्रभावित और दुर्गम आदिवासी अंचलों में जहां कभी भय, अलगाव और विकास की कमी हावी थी। वहीं अब सामाजिक बदलाव की नई बयार बह रही है। यह परिवर्तन किसी सरकारी योजना से नहीं, बल्कि महिलाओं की एक सशक्त पदयात्रा से संभव हुआ है। जिसने पिछले 15 वर्षों में सैकड़ों गांवों तक पहुंचकर नई चेतना जगाई है।
इस अभियान का नेतृत्व पद्मश्री सम्मानित फुलवासन यादव ने किया। जबकि शिव कुमार देवांगन के मार्गदर्शन में इसे निरंतर विस्तार मिला। इसकी शुरुआत 3 मार्च 2011 को पांच दिवसीय यात्रा के रूप में हुई थी, जो आज एक सतत सामाजिक आंदोलन का रूप ले चुकी है।
इस अभियान का प्रभाव बेहद सकारात्मक रहा है। लगभग 75 प्रतिशत महिलाएं स्व-सहायता समूहों से जुडक़र आत्मनिर्भर बनी हैं। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में जहां पहले डर का माहौल था। वहां अब विश्वास, संवाद और विकास की नई शुरुआत देखने को मिल रही है। सामाजिक पहल को प्रशासन और विभिन्न संस्थाओं का भी सहयोग मिला। वरिष्ठ अधिकारी, जनप्रतिनिधि, बैंकिंग संस्थानों के प्रतिनिधि और शिक्षाविद इसमें शामिल होकर इसे मजबूती देते रहे हैं।
राजेश साहू, मधुलिका, धनेश्वरी मंडावी, जानिया, शैल, आगसिया, सुनील, विनोद, डालेश्वर और ओमेश जैसे कार्यकर्ताओं की सक्रिय भागीदारी ने इस अभियान को जनआंदोलन का स्वरूप दिया। पदयात्रा एक प्रभावी सामाजिक मॉडल बनकर उभरी है। संगठित समाज, खासकर महिलाओं की भागीदारी से सबसे कठिन परिस्थितियों में भी बदलाव संभव है।
हर वर्ष 4-5 दिनों तक चलने वाली इस पदयात्रा ने अब तक 200 से अधिक गांवों में पहुंचकर लोगों को जागरूक किया है। खास बात यह है कि ये यात्राएं उन इलाकों में की गईं। जहां नक्सल प्रभाव गहरा रहा है और जहां बुनियादी सुविधाओं के साथ-साथ सरकारी योजनाओं की जानकारी भी सीमित थी। मानपुर, मोहला, चौकी, छुरिया, खैरागढ़ और छुईखदान जैसे ब्लॉकों के सुदूर गांवों- औंधी, भोजटोला, चिलहटी, पंडरापानी, देवरी और ठाकुरटोला तक पहुंचकर महिलाओं ने न केवल संवाद स्थापित किया, बल्कि सामाजिक मुद्दों पर जनजागरण भी किया।
पद्मश्री फुलवासन ने बताया कि इस पदयात्रा का उद्देश्य सिर्फ भ्रमण नहीं, बल्कि समाज के मूल सवालों पर काम करना रहा है। नशा मुक्ति, स्वच्छता, स्वास्थ्य जागरूकता, स्वरोजगार और स्व-सहायता समूहों के माध्यम से महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाना इसके प्रमुख लक्ष्य रहे हैं। उन्होने बताया कि गांव-गांव में इस यात्रा का स्वागत उत्सव की तरह हुआ। महिलाओं ने बढ़-चढ़कर भाग लिया। खाद्यान्न और आर्थिक सहयोग दिया, सामाजिक भेदभाव को खत्म करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। छुआछूत जैसी कुरीतियों को खत्म करने की दिशा में ठोस पहल हुई।
Updated on:
01 Apr 2026 08:21 pm
Published on:
01 Apr 2026 08:21 pm
