वनवास के दौरान राम ने की थी इस शिवलिंग की पूजा, मिली है 1860 में लंदन लिखी हुई घंटी

टेंपल कमेटी के उपाध्यक्ष विजय भारत ने बताया कि बस्तर दशहरा भी श्रीराम और मां दुर्गा से जुड़ी हुई है। फूल रथ परिक्रमा से पहले माता का छत्र दंतेश्वरी मंदिर से निकलता है, तो पहले कांकालीन मंदिर में पूजा होती है। फिर जगन्नाथ मंदिर परिसर में मौजूद श्रीराम मंदिर में पूजा होती है।

जगदलपुर. जगदलपुर से 10 किमी दूर ग्राम रामपाल में रामायण काल की शिवलिंग स्थापित है। बताया जाता है कि प्रभु श्रीराम वनवास के दौरान यहां पर लिंगेश्वर शिवलिंग की स्थापना किए थे। इसकी पुष्टी दिल्ली के श्रीराम सांस्कृतिक शोध संस्थान के विशेषज्ञों ने की है। यह शोध संस्थान 50 सालों से श्री राम के वनवास पर शोध कर रहे हैं। इसी शोध में यह जानकारी मिली है।

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ग्राम रामपाल में करीब 38 धाकड़ ठाकुर के परिवार रहता है। पूरा गांव राम और शिवभगवान की पूजा करता है। यहां स्थित लिंगेश्वर शिव मंदिर कई कविदंतियों, मान्यताओं और दंतकथाओं से जुड़ा हुआ है। यहां के पूजारी अर्जुन सिंह ठाकुर ने बताया कि उनके पुर्वज करीब डेढ़ सौ साल से इस लिंगेश्वर शिव की पूजा करते आ रहे हैं। कैलाश सिंह ठाकुर ने बताया कि खुदाई के दौरान यह शिवलिंग प्राप्त हुई है। जमीन के अंदर खुदाई कराने से शिवलिंग का अंत नहीं मिला।

खोदाई के दौरान जमीन के अंदर ऊपरी सतह की अपेक्षा शिवलिंग की मोटाई अधिक पाई गई। आज तक इस शिवलिंग का कोई अंत नही मिला है। मनेर सिंह ठाकुर ने बताया कि बचपन में शिवलिंग का ऊपरी सतह में कुछ गड्ढें थे, जो अब भर गए है। वहीं धीरे-धीरे शिवलिंग की लंबाई भी बढ़ रही है।

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बस्तर में इन जगहों पर रहे थे राम

वनवास के दौरान भगवान श्रीराम लंबे समय तक बस्तर में रहे। शोधकर्ता डॉ. राम अवतार ने अपने किताब में बताया कि श्री राम धमतरी से कांकेर पहुंचे। कांकेर में रामपुर जुनवानी, केशकाल घाटी शिव मंदिर, राकस हाड़ा नारायणपुर, चित्रकोट शिव मंदिर, तीरथगढ़ सीता कुंड, कोटि महेश्वर कोटुमसर कांगेर, ओडि़सा मल्कानगिरी, रामारम चिटमिट्टीन मंदिर सुकमा व इंजरम कोंटा में श्रीराम ने वनवास के दिनों में यहां से होकर गुजरे।

वनवास के दौरान राम ने की थी इस शिवलिंग की पूजा, मिली है 1860 में लन्दन लिखी हुई घंटी

बस्तर के दशहरे में फूलरथ की परिक्रमा भी श्रीराम और मां दुर्गा से जुड़ी हुई है

टेंपल कमेटी के उपाध्यक्ष विजय भारत ने बताया कि बस्तर दशहरा भी श्रीराम और मां दुर्गा से जुड़ी हुई है। फूल रथ परिक्रमा से पहले माता का छत्र दंतेश्वरी मंदिर से निकलता है, तो पहले कांकालीन मंदिर में पूजा होती है। फिर जगन्नाथ मंदिर परिसर में मौजूद श्रीराम मंदिर में पूजा होती है। इसके बाद दंतेश्वरी और राम मंदिर के पूजारी टोकरी में फूल लेकर रथ में चढ़ते है। यहां पर पूजा विधान के बाद ही फूलरथ की परिक्रमा होती है।

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मंदिर परिसर की खुदाई में मिला 1860 की घंटी

मंदिर के जीर्णोदार के लिए परिसर की खोदाई की गई। इस दौरान पुराने ईट, पत्थर और एक घंटी मिली है। इस घंटी में 1860 और लंदन लिखा हुआ है। शोधकर्ताओं से मिली जानकारी के अनुसार तत्कालीन ब्रिटिश राज्यपाल ने यह घंटी मंदिर में चढ़ाई थी। वहीं पुरातात्वीक विभाग ने ईट और पत्थर का सैंपल लिया है, जिससे यह पता लगाया जाएगा की यह कितना साल पुराना है। राजपूत क्षत्रिय धाकड़ समाज के जिला सहयोजक जगत सिंह ठाकुर ने बताया कि शोध में यह पुष्टी हुई है कि लिंगेश्वर शिवलिंग की स्थापना भगवान राम ने ही की है।

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