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बीकानेर सेप्टिक टैंक हादसा : ‘घर मत बताना कि अनिल चला गया…आंखें जैसे फटी की फटी रह गई थीं’

कभी आपने किसी की आंखों में ऐसा डर देखा है, जो मौत से होकर लौटा हो? गुरुवार को बीकानेर के ट्रोमा सेंटर में एक शख्स लेटा था, आंखें सूजी हुई, चेहरा पीला और गला इतना रूंधा था कि शब्द भी कांप कर बाहर आ रहे थे। उसका नाम है ओमप्रकाश।
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बीकानेर

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kamlesh sharma

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Updated: 23 May 2025, 3:06 PM IST

Bikaner septic tank accident

प्रत्यक्षदर्शी ओमप्रकाश और ट्रोमा सेंटर के बाहर हादसे के बाद बिलखते परिजन। फोटो पत्रिका

जयप्रकाश गहलोत/बीकानेर। कभी आपने किसी की आंखों में ऐसा डर देखा है, जो मौत से होकर लौटा हो? गुरुवार को बीकानेर के ट्रोमा सेंटर में एक शख्स लेटा था, आंखें सूजी हुई, चेहरा पीला और गला इतना रूंधा था कि शब्द भी कांप कर बाहर आ रहे थे। उसका नाम है ओमप्रकाश। कहता है, 'हम चारों रोज की तरह काम पर गए थे… लेकिन आज साथ हंसने वाले तीन साथी मुझसे बिछड़ गए। मैं उन्हें बचा नहीं पाया…।' इतना कहकर उसकी आंखें भर आईं। उसने सिर झुका लिया और जैसे पूरा हादसा उसकी आंखों के सामने दोबारा गुजरने लगा।

सागर सबसे पहले उतरा… फिर गणेश… फिर अनिल… और फिर…

ओमप्रकाश ने बताया कि सबसे पहले सागर सेप्टिक टैंक में उतरा। हम बाहर से देख रहे थे। कुछ पल बीते… कोई आवाज नहीं आई। फिर गणेश नीचे गया, फिर अनिल। तीनों अंदर गए, लेकिन कोई लौटकर बाहर नहीं आया। जब मैं भी उतरने लगा, तो मुझे सांस लेने में तकलीफ हुई। जैसे अंदर कुछ था जो जिंदगी खींच रहा था। मैंने मदद की गुहार लगाई। कुछ साथी दौड़े और मुझे खींचकर बाहर निकाला। जब आंख खुली, तो अस्पताल में था… और मेरे तीनों दोस्त इस दुनिया से जा चुके थे।

यह भी पढ़ें : बीकानेर में सेफ्टी टैंक की सफाई करने उतरे 3 श्रमिकों की दम घुटने से मौत

तीन मज़दूर, तीन घर, और अब…तीन अर्थियां

मारे गए श्रमिकों में अनिल, गणेश और सागरराज शामिल थे। अनिल और गणेश रिश्ते में साला-बहनोई थे। रोज साथ काम पर जाते, चाय पीते, परिवारों की बातें करते। पर अब सिर्फ उनकी तस्वीरें रह गई हैं। एक साथ गए चार दोस्त। एक लौटा, तीन अब कभी नहीं लौटेंगे।

घर मत बताना कि अनिल चला गया…

जब अनिल का शव अस्पताल पहुंचा, उसका बड़ा भाई मुकेश ज़मीन पर बैठ गया। आंखें जैसे फटी रह गई थीं। उसने रुंधे गले से कहा कि अभी मत बताना घर पर… कि अनिल अब नहीं रहा। बस इतना कह देना कि गर्मी से तबीयत बिगड़ गई है। मां सह नहीं पाएगी…। इतना कहकर वो दीवार से टिक कर बैठ गया। रोते हुए खुद को संभाल रहा था, जैसे कोई उम्मीद बाकी हो, लेकिन वह भी नहीं थी।

इस बार सिर्फ मजदूर नहीं मरे… भरोसा मरा है

हरबार हम ऐसे हादसों की खबरें पढ़ते हैं, दुख जताते हैं और भूल जाते हैं। लेकिन इस बार बात कुछ और है। इस बार सिर्फ मजदूर नहीं मरे। एक मां का बेटा गया, एक बच्चे का पिता गया, एक पत्नी का सुहाग गया। ओमप्रकाश जिंदा है, लेकिन उसकी आंखों में अब वो हंसी नहीं है, जो सुबह थी। वो पूछता है, ’’भगवान ने मुझे बचाया… पर मेरे दोस्तों को क्यों नहीं?’’ इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं है। हादसे के बाद चहुंओर शोक की लहर है। सवाल और भी हैं। क्या इनकी जान की कोई कीमत नहीं थी?’’ बिना किसी सुरक्षा उपकरण के श्रमिकों को गैस भरे टैंक में उतार देना… यह लापरवाही नहीं, सीधी हत्या जैसी लगती है।