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शास्त्रीय नृत्य में साकार हुई श्रीकृष्ण की बाल लीलाएं, इस अन्तर राष्ट्रीय नृत्यांगना ने दी मनमोहक प्रस्तुतियां

स्पिक मैके बीकानेर की ओर से करणीनगर स्थित आरएनआरएसवी स्कूल परिसर में अन्तर राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त नृत्यांगना डॉ. मीरनंदा बरठाकुर का नृत्य आयोजित किया गया।

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Classical dance

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बीकानेर. स्पिक मैके बीकानेर की ओर से करणीनगर स्थित आरएनआरएसवी स्कूल परिसर में अन्तर राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त नृत्यांगना डॉ. मीरनंदा बरठाकुर का नृत्य आयोजित किया गया। ठाकुर ने सत्रीय (आसाम) शैली के नृत्य के माध्यम से कृष्ण की बाल लीलाओं को मंच पर साकार किया।

सह कलाकार गौतम बायोन के स्वर 'गोविन्द दूधह पीयो...Ó विभिन्न भाव भंमिमाओं के साथ नृत्य की मनमोहक प्रस्तुतियां देकर पर नृत्यांगना बरठाकुर ने कृष्ण-यशोदा के अनन्य वात्सल्य का दर्शकों को आभास कराया। वायलियन व मृदंग की संगत पर वंदना की। साथ ही सत्रीय नृत्य की उत्पत्ति, विस्तार व विकास से विद्यार्थियों को रुबरू कराया। कलाकार ने छात्राओं के साथ मंच साझा किया।

अंत में सीता स्वयंवर के प्रसंग को नृत्य नाटिका के माध्यम से साकार किया। ठाकुर के साथ वायलियन पर दीपेन शर्मा, मृदंग पर जगतचंद्र व गायन में गौतम बायोन ने संगत की। इस मौके पर मंडल रेल प्रबंधक अनिल दुबे, हनुमान प्रसाद व्यास, बिन्दू बिश्नोई, रामलाल स्वामी आदि मौजूद रहे। स्कूल के सुभाष स्वामी ने कलाकारों का स्वागत किया।

फड़ पेटिंग बनाने के सीखे गुर
बीकानेर. स्पिक मैके बीकानेर अध्याय एवं उत्तर पश्चिम रेलवे ललितकला एवं सांस्कृतिक संस्थान की ओर से रेलवे ऑफिसर क्लब में चल रही छह दिवसीय फड़ पेटिंग की कार्यशाला में मंगलवार को बड़ी संख्या में विद्यार्थी पहुंचे। चितौडग़ढ़ के फड़ चित्रकार सत्यनरायण जोशी ने टेराकोटा, पेपरमैसी पर मधुबनी आर्ट से प्रतिभागियों को रुबरू कराया। स्पिक के राज्य सचिव दामोदर तंवर ने बताया कि फड़ पेटिंग के वर्कशॉप में 35 विद्यार्थी प्रशिक्षण ले रहे हैं।


गुरु-शिष्य परम्परा के सामने रियलिटी शो का कोई मायना नहीं
नृत्यांगना डॉ. मीरनंदा बरठाकुर ने राजस्थान पत्रिका से बातचीत में कहा है कि रियलिटी शो प्रतिभाओं के लिए कोई मायने नहीं रखते। किसी भी क्षेत्र में आगे बढऩे के लिए गुरु-शिष्य परम्परा ही कारगर है। नई पीढ़ी को स्टेज पर किसी गाने पर डांस कर आगे बढऩे की ललक रखने के बजाय परम्परागत रूप से गुणीजन गुरु से तालिम हासिल करनी चाहिए, ताकि जीवन में एक शृंखला बनी रहे।

जीवन में अनुशासन भी जरूरी है। एक उम्र तक गुरुकुल में रहना चाहिए। गौरतलब है कि डॉ. मीरनंदा बरठाकुर आठ साल की बाल्यावस्था में ही इस विधा से जुड़ गई। पदमश्री गुरु पुष्पा भुयान व बरबायन टंकेश्वर हजारिका से नृत्य की बारीकियां सीखी है। उनके आशीष से अब तक कई पुरस्कार, सम्मान मिल चुके हैं। सत्रीय नृत्य के बारे में उन्होंने बताया कि भले ही सत्रीय नृत्य कहने को आसाम का लोकनृत्य है, लेकिन इसमें शास्त्रीयता भी सुदृढ़ता के साथ समाहित है। इसका साहित्य है, जो अंग अभिनय वो भी अन्य शास्त्रीय नृत्यों से थोड़ा अलग है।