
बीकानेर में उड़ती चील को गुलगुले खिलाने की अनुठी परंपरा, पत्रिका फोटो
बीकानेर। सनातन धर्म में दान, पशु-पक्षियों और जरूरतमंदों की सेवा को विशेष पुण्यदायी माना गया है। धर्मशास्त्रों में अनिष्ट निवारण और बाधा दूर करने के लिए विशेष अवसरों पर विशिष्ट दान का उल्लेख मिलता है। मळमास के दौरान तेल और तिल से बनी वस्तुओं के दान का खास महत्व बताया गया है।
बीकानेर में मळमास के दौरान ऐसी ही एक अनूठी परंपरा देखने को मिलती है, जहां लोग आकाश में उड़ती चील को आटा, गुड़ और तेल से बने गुलगुले श्रद्धा के साथ खिलाते हैं। स्थानीय लोगों में चील को मां करणी का स्वरूप मानने की भी गहरी आस्था है। इसी के चलते श्रद्धालु पूरी निष्ठा से यह दान करते हैं।
गुलगुले बनाने के कार्य से पीढ़ियों से जुड़े बुलाकीराम मोदी बताते हैं कि गुलगुले आटा, गुड़ और तेल से तैयार किए जाते हैं। आटे और गुड़ से गोल आकार बनाकर इन्हें तेल में तला जाता है।
गुलगुले बनाने के कार्य से पीढ़ियों से जुड़े बुलाकीराम मोदी बताते हैं कि गुलगुले आटा, गुड़ और तेल से तैयार किए जाते हैं। आटे और गुड़ से गोल आकार बनाकर इन्हें तेल में तला जाता है।
कोटगेट सट्टा बाजार स्थित गली में पूरे साल यह परंपरा चलती रहती है, लेकिन मळमास में गुलगुलों का दान विशेष रूप से बढ़ जाता है। इसके अलावा श्राद्ध पक्ष, नवरात्रा, शनिवार, मंगलवार, अमावस्या और पूर्णिमा के दिन भी बड़ी संख्या में लोग यहां पहुंचते हैं।
सांखला रेल फाटक और सट्टा बाजार के ऊपर दोपहर के समय चील झुंड के रूप में आकाश में मंडराती रहती है। बुलाकी राम के अनुसार चील 80 से 100 फीट की ऊंचाई पर उड़ती है। जैसे ही वह 30–40 फीट की ऊंचाई तक आती है, नीचे से फेंका गया गुलगुला अपने पंजों में दबोचकर ले जाती है। सट्टा बाजार क्षेत्र में एक ही परिवार पिछली तीन पीढ़ियों से चील के लिए गुलगुले बनाने और खिलाने का कार्य कर रहा है। पहले शिवनारायण मोदी, फिर उनके पुत्र और अब तीसरी पीढ़ी में बुलाकी राम मोदी। वे रोजाना करीब 30 किलो आटे से गुलगुले बनाते हैं।
बुलाकी राम बताते हैं कि पहले की तुलना में अब चील की संख्या कम हो गई है। पहले दिनभर कई झुंड आसमान में मंडराते रहते थे, जबकि अब संख्या धीरे-धीरे घट रही है। एक झुंड में चील की संख्या 15–20 से लेकर 70–80 तक हो सकती है।
चील की उड़ान की दिशा और ऊंचाई को देखकर जमीन से गुलगुले फेंके जाते हैं। तेज रफ्तार से उड़ती चील एक ही झपट में गुलगुले को पकड़ लेती है। यह दृश्य श्रद्धा के साथ रोमांच भी पैदा करता है।
एमजीएसयू के पर्यावरण विभागाध्यक्ष प्रो. अनिल छंगाणी बताते हैं कि चील सर्वाहारी होती है। यह चूहों के साथ-साथ गुलगुले भी खा सकती है। पेड़ों की संख्या घटने से इनके आवास कम हुए हैं, जिसका असर चील की संख्या पर भी पड़ा है।
ज्योतिषाचार्य पंडित राजेन्द्र किराडू बताते हैं कि ज्योतिषशास्त्र और लाल किताब के अनुसार राहु या शनि दोष होने पर चील को गुलगुले खिलाने से नकारात्मक प्रभाव कम होते हैं। विशेष रूप से शनिवार और अमावस्या के दिन यह उपाय प्रभावी माना गया है। मान्यता है कि इससे शत्रुबाधा, राजकीय अड़चन और नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है तथा कार्यों में सफलता मिलती है।
Published on:
23 Dec 2025 09:36 am
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