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Bikaner: राजस्थान में रेत में उगते ‘सफेद सोने’ से किसान हो रहे मालामाल, कम जमीन-कम लागत में सालभर आय

Bikaner Mushroom Farming: रेगिस्तानी मिजाज, सीमित वर्षा और बढ़ती कृषि लागत। इन चुनौतियों के बीच बीकानेर संभाग के किसान अब मशरूम खेती को एक भरोसेमंद विकल्प के रूप में अपना रहे हैं। विज्ञान और तकनीक के सहयोग से नियंत्रित तापमान व आर्द्रता में उगाई जाने वाली यह फसल न केवल कम भूमि मांगती है, बल्कि कम समय में बेहतर आय भी देती है।

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बीकानेर

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Anand Prakash Yadav

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बृजेश सिंह

Mar 01, 2026

अब ऐसे भी हो रही मशरूम की पैदावार, पत्रिका फोटो

अब ऐसे भी हो रही मशरूम की पैदावार, पत्रिका फोटो

Bikaner Mushroom Farming: रेगिस्तानी मिजाज, सीमित वर्षा और बढ़ती कृषि लागत। इन चुनौतियों के बीच बीकानेर संभाग के किसान अब मशरूम खेती को एक भरोसेमंद विकल्प के रूप में अपना रहे हैं। विज्ञान और तकनीक के सहयोग से नियंत्रित तापमान व आर्द्रता में उगाई जाने वाली यह फसल न केवल कम भूमि मांगती है, बल्कि कम समय में बेहतर आय भी देती है। यही कारण है कि भूमिहीन किसान, छोटे काश्तकार और महिला स्वयं सहायता समूह भी इस ओर आकर्षित हो रहे हैं।

चार किस्में, 12 महीने उत्पादन

बीकानेर की खास बात यह है कि यहां 16 से 24 डिग्री (और आगे बढ़कर 30-35 डिग्री तक) के नियंत्रित तापमान में भी चारों प्रमुख किस्मों का उत्पादन संभव हो गया है। इसमें बटन मशरूम अक्टूबर से फरवरी के बीच में बोई जाती है। फलन के लिए 15-18 डिग्री, ऑयस्टर मशरूम मार्च से जून तक 25-30 डिग्री, मिल्की (दुधिया) मशरूम जुलाई से सितंबर तक 30-35 डिग्री, 80-90% आर्द्रता में पैदा होती है। विशेषज्ञ बताते हैं कि शुष्क क्षेत्र होने के बावजूद कंट्रोल्ड एनवायरनमेंट (तापमान आर्द्रता) अपनाकर स्थिर उत्पादन लिया जा सकता है।

कमरा या छप्पर ही काफी

मशरूम के लिए खेत की जरूरत नहीं। घर का खाली कमरा, कच्ची झोपड़ी या छप्पर पर्याप्त है। 20 गुणा 20 फीट की कच्ची झोपड़ी में भी इस पैदावार शुरू हो सकती है। लगभग 35-40 हजार रुपए की शुरुआती लागत में इसकी पैदावार शुरू की जा सकती है। फॉगर्स, एग्जॉस्ट, शेड-नेट और थर्मो-हाइग्रोमीटर से तापमान-नमी नियंत्रण के साथ एक छोटी उत्पादन इकाई तैयार हो सकती है। यह मॉडल समावेशी खेती का मजबूत उदाहरण है, जहां संसाधन सीमित हों, वहां भी आय सृजन संभव है।

प्रोटीन का भरोसा, बाजार की मांग

मशरूम पोषण में समृद्ध उच्च प्रोटीन, फाइबर, विटामिन-बी कॉम्प्लेक्स और कम वसा वाला खाद्य है। शहरी उपभोक्ताओं, होटलों और प्रोसेसिंग यूनिट्स में मांग लगातार बढ़ रही है। स्थानीय स्तर पर ताज़ा आपूर्ति होने से परिवहन लागत भी घटती है, जिससे किसान का मार्जिन बढ़ता है।

वैज्ञानिक मार्गदर्शन से बेहतर परिणाम

स्वामी केशवानंद राजस्थान कृषि विश्वविद्यालय के मशरूम प्रोजेक्ट से जुड़े विशेषज्ञों के अनुसार, सही स्पॉन गुणवत्ता, स्वच्छता (हाइजीन) और समयबद्ध कटाई से उत्पादकता में सुधार आता है। डॉ. अशोक कुमार (मशरूम प्रोजेक्ट प्रभारी) के मुताबिक बटन, ऑयस्टर और मिल्की, तीनों किस्में क्षेत्र के तापमान चक्र के अनुरूप अपनाई जा सकती हैं। नियंत्रित वातावरण में शुष्कता बाधा नहीं बनती।

आय का गणित

  • ऑयस्टर/मिल्की: 30-45 दिनों में पहली कटाई
  • छोटी इकाई से प्रति चक्र 15-25% शुद्ध लाभ संभव
  • साल में 4-6 चक्र लेकर आय स्थिर की जा सकती है
  • मूल्य संवर्धन (सूखा मशरूम, पाउडर, पैकेजिंग) से लाभ और बढ़ता है

300 से अधिक किसानों को दिया प्रशिक्षण

कृषि विवि ने चार ट्रेनिंग सत्रों में तकरीबन 300 किसानों को मशरूम पैदावार के लिए वैज्ञानिक तकनीक से प्रशिक्षित कराया। कुछ किसान बड़े पैमाने पर इकाइयां लगा कर मशरूम की पैदावार करने की योजना को भी अंतिम रूप दे चुके हैं।

किसानों को प्रशिक्षित कर रहे

मेडिशनल वेल्यू वाली यह खेती छोटी सी जगह में कम लागत में हो सकती है। साथ ही किसान अच्छा लाभ भी कमा सकते हैं। इसकी खेती कहीं भी हो सकती है। मशरूम की खेती के लिए विश्वविद्यालय की ओर से भी किसानों को प्रशिक्षित किया जा रहा है। -डॉ. राजेंद्र बाबू दुबे, कुलगुरु, कृषि विवि बीकानेर